महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1611, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशक्रो भृशं सुसुखी पार्थिवेन्द्र प्रीतिं चेच्छत्यजरां वै त्वया सः । देवाश्च सर्वे वशगास्तस्य राजन् संदेशं त्वं शृणु मे देवराज्ञः ॥ १४ ॥ **अग्निदेवने कहा—**राजेन्द्र! देवराज इन्द्र बड़े सुखसे हैं और आपके साथ अटूट मैत्री जोड़ना चाहते हैं। सम्पूर्ण देवता भी उनके अधीन ही हैं। अब आप मुझसे देवराज इन्द्रका संदेश सुनिये ॥ १४ ॥
यदर्थं मां प्राहिणोत् त्वत्सकाशं बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । अयं गुरुर्याजयतां नृप त्वां मर्त्यं सन्तममरं त्वां करोतु ॥ १५ ॥ उन्होंने जिस कामके लिये मुझे आपके पास भेजा है, उसे सुनिये। वे मेरे द्वारा बृहस्पतिजीको आपके पास भेजना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि बृहस्पतिजी आपके गुरु हैं। अतः ये ही आपका यज्ञ करायेंगे। आप मरणधर्मा मनुष्य हैं। ये आपको अमर बना देंगे ॥ १५ ॥
मरुत्त उवाच
संवर्तोऽयं याजयिता द्विजो मां बृहस्पतेरञ्जलिरेष तस्य । न चैवासौ याजयित्वा महेन्द्रं मर्त्यं सन्तं याजयन्नद्य शोभेत् ॥ १६ ॥ **मरुत्तने कहा—**भगवन्! मेरा यज्ञ ये विप्रवर संवर्तजी करायेंगे। बृहस्पतिजीके लिये तो मेरी यह अञ्जलि जुड़ी हुई है। महेन्द्रका यज्ञ कराकर अब मेरे-जैसे मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ करानेमें उनकी शोभा नहीं है ॥ १६ ॥
अग्निरुवाच
ये वै लोका देवलोके महान्तः सम्प्राप्स्यसे तान् देवराजप्रसादात् । त्वां चेदसौ याजयेद् वै बृहस्पति- र्नूनं स्वर्गं त्वं जयेः कीर्तियुक्तः ॥ १७ ॥ तथा लोका मानुषा ये च दिव्याः प्रजापतेश्चापि ये वै महान्तः । ते ते जिता देवराज्यं च कृत्स्नं बृहस्पतिर्याजयेच्चेन्नरेन्द्र ॥ १८ ॥