भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1610, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1610

अग्निरुवाच

आसनं सलिलं पाद्यं प्रतिनन्दामि तेऽनघ ।
इन्द्रेण तु समादिष्टं विद्धि मां दूतमागतम् ॥ १२ ॥
**अग्निने कहा—**निष्पाप नरेश! आपके दिये हुए पाद्य, अर्घ्य और आसन आदिका अभिनन्दन करता हूँ। आपको मालूम होना चाहिये कि इस समय मैं इन्द्रका संदेश लेकर उनका दूत बनकर आपके पास आया हूँ ॥ १२ ॥

मरुत्त उवाच

कच्चिच्छ्रीमान् देवराजः सुखी च
कच्चिच्चास्मान् प्रीयते धूमकेतो ।
कच्चिद्देवा अस्य वशे यथावत्
प्रब्रूहि त्वं मम कात्स्न्यैन देव ॥ १३ ॥
**मरुत्तने कहा—**अग्निदेव! श्रीमान् देवराज सुखी तो हैं न? धूमकेतो! वे हमलोगोंपर प्रसन्न हैं न? सम्पूर्ण देवता उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं न? देव! ये सारी बातें आप मुझे ठीक-ठीक बताइये ॥ १३ ॥

अग्निरुवाच