महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1609, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्र उवाच
एहि गच्छ प्रहितो जातवेदो बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । अयं वै त्वां याजयिता बृहस्पति- स्तथामरं चैव करिष्यतीति ॥ ८ ॥ तब इन्द्रने अग्निदेवसे कहा— जातवेदा! इधर आओ और मेरा संदेश लेकर मरुत्तके पास जाओ। मरुत्तकी सम्मति लेकर बृहस्पतिजीको उनके पास पहुँचा देना। वहाँ जाकर राजासे कहना कि 'ये बृहस्पतिजी ही आपका यज्ञ करायेंगे तथा ये आपको अमर भी कर देंगे' ॥ ८ ॥
अग्निरुवाच
अहं गच्छामि मघवन् दूतोऽद्य बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । वाचं सत्यां पुरुहूतस्य कर्तुं बृहस्पतेश्चापचितिं चिकीर्षुः ॥ ९ ॥ अग्निदेवने कहा— मघवन्! मैं बृहस्पतिजीको मरुत्तके पास पहुँचा आनेके लिये आज आपका दूत बनकर जा रहा हूँ। ऐसा करके मैं देवेन्द्रकी आज्ञाका पालन और बृहस्पतिजीका सम्मान करना चाहता हूँ ॥ ९ ॥
व्यास उवाच
ततः प्रायाद् धूमकेतुर्महात्मा वनस्पतीन् वीरुधश्चापमृद्नन् । कामाद्धिमान्ते परिवर्तमानः काष्ठातिगो मातरिश्वैव नर्दन् ॥ १० ॥ व्यासजी कहते हैं— यह कहकर धूममय ध्वजावाले महात्मा अग्निदेव वनस्पतियों और लताओंको रौंदते हुए वहाँसे चल दिये। ठीक उसी तरह जैसे शीतकालके अन्तमें स्वच्छन्दतापूर्वक बहनेवाली दिगन्तव्यापिनी वायु विशेष गर्जना करती हुई आगे बढ़ रही हो ॥ १० ॥
मरुत्त उवाच
आश्चर्यमद्य पश्यामि रूपिणं वह्निमागतम् । आसनं सलिलं पाद्यं गां चोपानय वै मुने ॥ ११ ॥ मरुत्तने कहा— मुने! बड़े आश्चर्यकी बात है कि आज मैं मूर्तिमान् अग्निदेवको यहाँ आया देख रहा हूँ। आप इनके लिये आसन, पाद्य, अर्घ्य और गौ प्रस्तुत कीजिये ॥ ११ ॥