भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1613, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1613

पुनः पुनः स मया याच्यमानः ॥ २२ ॥
**अग्निने कहा—**देवराज! राजा मरुत्तको आपकी बात पसंद नहीं आयी। बृहस्पतिजीको तो उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम कहलाया है। मेरे बारंबार अनुरोध करनेपर भी उन्होंने यही उत्तर दिया है कि 'संवर्तजी ही मेरा यज्ञ करायेंगे' ॥ २२ ॥
उवाचेदं मानुषा ये च दिव्याः
प्रजापतेर्ये च लोका महान्तः ।
तांश्चेल्लभयं संविदं तेन कृत्वा
तथापि नेच्छेयमिति प्रतीतः ॥ २३ ॥
उन्होंने यह भी कहा है कि 'जो मनुष्यलोक, दिव्यलोक और प्रजापतिके महान् लोक हैं, उन्हें भी यदि इन्द्रके साथ समझौता करके ही पा सकता हूँ तो भी मैं बृहस्पतिजीको अपने यज्ञका पुरोहित बनाना नहीं चाहता हूँ। यह मैं दृढ़ निश्चयके साथ कह रहा हूँ' ॥ २३ ॥

इन्द्र उवाच

पुनर्गत्वा पार्थिवं त्वं समेत्य
वाक्यं मदीयं प्रापय स्वार्थयुक्तम् ।
पुनर्यद् युक्तो न करिष्यते वच-
स्त्वत्तो वज्रं सम्प्रहर्त्तास्मि तस्मै ॥ २४ ॥
**इन्द्रने कहा—**अग्निदेव! एक बार फिर जाकर राजा मरुत्तसे मिलो और मेरा अर्थयुक्त संदेश उनके पास पहुँचा दो। यदि तुम्हारे द्वारा दोबारा कहनेपर भी मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं उनके ऊपर वज्रका प्रहार करूँगा ॥ २४ ॥

अग्निरुवाच

गन्धर्वराड् यत्वयं तत्र दूतो
बिभेम्यहं वासव तत्र गन्तुम् ।
संरब्धो मामब्रवीत् तीक्ष्णरोषः
संवर्तो वाक्यं चरितब्रह्मचर्यः ॥ २५ ॥
यद्यागच्छेः पुनरेवं कथंचिद्
बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते ।
दहेयं त्वां चक्षुषा दारुणेन
संक्रुद्ध इत्येतदवैहि शक्र ॥ २६ ॥
**अग्निने कहा—**देवेन्द्र! ये गन्धर्वराज वहाँ दूत बनकर जायँ। मैं दुबारा वहाँ जानेसे डरता हूँ; क्योंकि ब्रह्मचारी संवर्तने तीव्र रोषमें भरकर मुझसे कहा था कि 'अग्ने! यदि फिर इस प्रकार किसी तरह बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये आओगे तो मैं कुपित हो