महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा।' इन्द्र! उनकी इस बातको अच्छी तरह समझ लीजिये ।। २५-२६ ।।
शक्र उवाच
त्वमेवान्यान् दहसे जातवेदो न हि त्वदन्यो विद्यते भस्मकर्ता । त्वत्संस्पर्शात् सर्वलोको बिभेति अश्रद्धेयं वदसे हव्यवाह ।। २७ ।।
**इन्द्रने कहा—**हव्यवाहन! अग्निदेव! तुम तो ऐसी बात कह रहे हो, जिसपर विश्वास नहीं होता; क्योंकि तुम्हीं दूसरोंको भस्म करते हो। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भस्म करनेवाला नहीं है। तुम्हारे स्पर्शसे सभी लोग डरते हैं ।। २७ ।।
अग्निरुवाच
दिवं देवेन्द्र पृथिवीं च सर्वां संवेष्टयेस्त्वं स्वबलेनैव शक्र । एवंविधस्येह सतस्तवासौ कथं वृत्रस्त्रिदिवं प्राग् जहार ।। २८ ।।
**अग्निदेवने कहा—**देवेन्द्र! आप भी तो अपने बलसे सारी पृथ्वी और स्वर्गलोकको आवेष्टित किये हुए हैं। ऐसे होनेपर भी आपके इस स्वर्गको पूर्वकालमें वृत्रासुरने कैसे हर लिया? ।। २८ ।।
इन्द्र उवाच
न गण्डिकाकारयोगं करेऽणुं न चारिसोमं प्रपिबामि वह्ने । न क्षीणशक्तौ प्रहरामि वज्रं को मेऽसुखाय प्रहरेत मर्त्यः ।। २९ ।।
**इन्द्रने कहा—**अग्निदेव! मैं पर्वतको भी मक्खीके समान छोटा कर सकता हूँ तो भी शत्रुका दिया हुआ सोमरस नहीं पीता हूँ और जिसकी शक्ति क्षीण हो गयी है, ऐसे शत्रुपर वज्रका प्रहार नहीं करता। फिर भी कौन ऐसा मनुष्य है जो मुझे कष्ट पहुँचानेके लिये मुझपर प्रहार कर सके? ।। २९ ।।
प्रव्राजयेयं कालकेयान् पृथिव्या- मपाकर्षन् दानवानन्तरिक्षात् । दिवः प्रह्लादमवसानमानयं को मेऽसुखाय प्रहरेत मानवः ।। ३० ।।