महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1777, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्पूर्ण संसारको जन्म देनेवाला अहंकार अध्यात्म है और अभिमान उसका अधिभूत तथा रुद्र उसके अधिष्ठाता देवता हैं ॥ ३० ½ ॥
अध्यात्मं बुद्धिरित्याहुः षडिन्द्रियविचारिणी ॥ ३१ ॥
अधिभूतं तु मन्तव्यं ब्रह्मा तत्राधिदैवतम् ।
पाँच इन्द्रियों और छठे मनको जाननेवाली बुद्धिको अध्यात्म कहते हैं। मन्तव्य उसका अधिभूत और ब्रह्मा उसके अधिदेवता हैं ॥ ३१ ½ ॥
त्रीणि स्थानानि भूतानां चतुर्थं नोपपद्यते ॥ ३२ ॥
स्थलमापस्तथाऽऽकाशं जन्म चापि चतुर्विधम् ।
अण्डजोद्भिज्जसंस्वेदजरायुजमथापि च ॥ ३३ ॥
चतुर्धा जन्म इत्येतद् भूतग्रामस्य लक्ष्यते ।
प्राणियोंके रहनेके तीन ही स्थान हैं—जल, थल और आकाश। चौथा स्थान सम्भव नहीं है। देहधारियोंका जन्म चार प्रकारका होता है—अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज। समस्त भूत-समुदायका यह चार प्रकारका ही जन्म देखा जाता है ॥ ३२-३३ ½ ॥
अपराण्यथ भूतानि खेचराणि तथैव च ॥ ३४ ॥
अण्डजानि विजानीयात् सर्वांश्चैव सरीसृपान् ।
इनके अतिरिक्त जो दूसरे आकाशचारी प्राणी हैं तथा जो पेटसे चलनेवाले सर्प आदि हैं, उन सबको भी अण्डज जानना चाहिये ॥ ३४ ½ ॥
स्वेदजाः कृमयः प्रोक्ता जन्तवश्च यथाक्रमम् ॥ ३५ ॥
जन्म द्वितीयमित्येतज्जघन्यतरमुच्यते ।
पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले जू आदि कीट और जन्तु स्वेदज कहे जाते हैं। यह क्रमशः दूसरा जन्म पहलेकी अपेक्षा निम्न स्तरका कहा जाता है ॥ ३५ ½ ॥
भित्त्वा तु पृथिवीं यानि जायन्ते कालपर्ययात् ॥ ३६ ॥
उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि द्विजसत्तमाः ।
द्विजवरो! जो पृथिवीको फोड़कर समयपर उत्पन्न होते हैं, उन प्राणियोंको उद्भिज्ज कहते हैं ॥ ३६ ½ ॥
द्विपादबहुपादानि तिर्यग्गतिमतीनि च ॥ ३७ ॥
जरायुजानि भूतानि विकृतान्यपि सत्तमाः ।
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! दो पैरवाले, बहुत पैरवाले एवं टेढ़े-मेढ़े चलनेवाले तथा विकृत रूपवाले प्राणी जरायुज हैं ॥ ३७ ½ ॥
द्विविधा खलु विज्ञेया ब्रह्मयोनिः सनातनी ॥ ३८ ॥
तपः कर्म च यत्पुण्यमित्येष विदुषां नयः ।