महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1780, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंधातुओंसे युक्त है, जो संसर्गमें रत और जड है, उसको शरीर समझना चाहिये ॥ ५१—५३ ॥
दुश्चरं सर्वलोकेऽस्मिन् सत्त्वं प्रति समाश्रितम् ।
एतदेव हि लोकेऽस्मिन् कालचक्रं प्रवर्तते ॥ ५४ ॥
जिसका सम्पूर्ण लोकमें विचरण करना दुःखद है, जो बुद्धिके आश्रित है, वही इस लोकमें कालचक्र है ॥ ५४ ॥
एतन्महार्णवं घोरमगाधं मोहसंज्ञितम् ।
विक्षिपेत् संक्षिपेच्चैव बोधयेत् सामरं जगत् ॥ ५५ ॥
यह कालचक्र घोर अगाध और मोह नामसे कहा जानेवाला बड़ा भारी समुद्ररूप है। यह देवताओंके सहित समस्त जगत्का संक्षेप और विस्तार करता है तथा सबको जगाता है ॥ ५५ ॥
कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमतथानृतम् ।
इन्द्रियाणां निरोधेन सदा त्यजति दुस्त्यजान् ॥ ५६ ॥
सदा इन्द्रियोंके निरोधसे मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य—इन सब दुस्त्यज अवगुणोंको त्याग देता है ॥ ५६ ॥
यस्यैते निर्जिता लोके त्रिगुणाः पञ्चधातवः ।
व्योम्नि तस्य परं स्थानमानन्त्यमथ लभ्यते ॥ ५७ ॥
जिसने इस लोकमें तीन गुणोंवाले पाञ्चभौतिक देहका अभिमान त्याग दिया है, उसे अपने हृदयाकाशमें परब्रह्मरूप उत्तम पदकी उपलब्धि होती है—वह मोक्षको प्राप्त हो जाता है ॥ ५७ ॥
पञ्चेन्द्रियमहाकूलां मनोवेगमहोदकाम् ।
नदीं मोहह्रदां तीर्त्वा कामक्रोधावुभौ जयेत् ॥ ५८ ॥
स सर्वदोषनिर्मुक्तस्ततः पश्यति तत्परम् ।
जिसमें पाँच इन्द्रियरूपी बड़े कगारे हैं, जो मनोवेग-रूपी महान् जलराशिसे भरी हुई है और जिसके भीतर मोहमय कुण्ड है, उस देहरूपी नदीको लाँघकर जो काम और क्रोध—दोनोंको जीत लेता है, वही सब दोषोंसे मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करता है ॥ ५८ १/२ ॥
मनो मनसि संधाय पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ ५९ ॥
सर्ववित् सर्वभूतेषु विन्दत्यात्मानमात्मनि ।
जो मनको हृदयकमलमें स्थापित करके अपने भीतर ही ध्यानके द्वारा आत्मदर्शनका प्रयत्न करता है, वह सम्पूर्ण भूतोंमें सर्वज्ञ होता है और उसे अन्तःकरणमें परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है ॥ ५९ १/२ ॥
एकधा बहुधा चैव विकुर्वाणस्ततस्ततः ॥ ६० ॥