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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1801, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1801

असंवृतानि गृह्णीयात् प्रवृत्तानि च कार्यवान् ।। ३६ ।।
मिट्टी, जल, अन्न, पत्र, पुष्प और फल—ये वस्तुएँ यदि किसीके अधिकारमें न हों तो आवश्यकता पड़नेपर क्रियाशील संन्यासी इन्हें काममें ला सकता है ।। ३६ ।।
न शिल्पजीविकां जीवेद्धिरण्यं नोत कामयेत् ।
न द्वेष्टा नोपदेष्टा च भवेच्च निरुपस्कृतः ।। ३७ ।।
वह शिल्पकारी करके जीविका न चलावे, सुवर्णकी इच्छा न करे। किसीसे द्वेष न करे और उपदेशक न बने तथा संग्रहरहित रहे ।। ३७ ।।
श्रद्धापूतानि भुञ्जीत निमित्तानि च वर्जयेत् ।
सुधावृत्तिरसक्तश्च सर्वभूतैरसंविदम् ।। ३८ ।।
श्रद्धासे प्राप्त हुए पवित्र अन्नका आहार करे। मनमें कोई निमित्त न रखे। सबके साथ अमृतके समान मधुर बर्ताव करे, कहीं भी आसक्त न हो और किसी भी प्राणीके साथ परिचय न बढ़ावे ।। ३८ ।।
आशीर्युक्तानि सर्वाणि हिंसायुक्तानि यानि च ।
लोकसंग्रहधर्मं च नैव कुर्यान्न कारयेत् ।। ३९ ।।
जितने भी कामना और हिंसासे युक्त कर्म हैं, उन सबका एवं लौकिक कर्मोंका न स्वयं अनुष्ठान करे और न दूसरोंसे करावे ।। ३९ ।।
सर्वभावानतिक्रम्य लघुमात्रः परिव्रजेत् ।
समः सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ।। ४० ।।
सब प्रकारके पदार्थोंकी आसक्तिका उल्लंघन करके थोड़ेमें संतुष्ट हो सब ओर विचरता रहे। स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंके प्रति समान भाव रखे ।। ४० ।।
परं नोद्वेजयेत् काचिन्न च कस्यचिदुद्विजेत् ।
विश्वास्यः सर्वभूतानामग्र्यो मोक्षविदुच्यते ।। ४१ ।।
किसी दूसरे प्राणीको उद्वेगमें न डाले और स्वयं भी किसीसे उद्विग्न न हो। जो सब प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है, वह सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष-धर्मका ज्ञाता कहलाता है ।। ४१ ।।
अनागतं च न ध्यायेन्नातीतमनुचिन्तयेत् ।
वर्तमानमुपेक्षेत कालाकाङ्क्षी समाहितः ।। ४२ ।।
संन्यासीको उचित है कि भविष्यके लिये विचार न करे, बीती हुई घटनाका चिन्तन न करे और वर्तमानकी भी उपेक्षा कर दे। केवल कालकी प्रतीक्षा करता हुआ चित्तवृत्तियोंका समाधान करता रहे ।। ४२ ।।
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेत् क्वचित् ।
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा किंचिद् दुष्टं समाचरेत् ।। ४३ ।।

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