महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1803, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोता; क्योंकि वह बाह्य चिह्नसे रहित मानी गयी है। इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये॥ ५०-५१॥ गूढधर्माश्रितो विद्वान् विज्ञानचरितं चरेत्। अमूढो मूढरूपेण चरेद् धर्ममदूषयन्॥ ५२॥ गुह्य धर्ममें स्थित विद्वान् पुरुषको उचित है कि वह विज्ञानके अनुरूप आचरण करे। मूढ़ न होकर भी मूढ़के समान बर्ताव करे, किंतु अपने किसी व्यवहारसे धर्मको कलंकित न करे॥ ५२॥ तथैनमवमन्येरन् परे सततमेव हि। यथावृत्तश्चरेच्छान्तः सतां धर्मानकुत्सयन्॥ ५३॥ य एवं वृत्तसम्पन्नः स मुनिः श्रेष्ठ उच्यते। जिस कामके करनेसे समाजके दूसरे लोग अनादर करें, वैसा ही काम शान्त रहकर सदा करता रहे, किंतु सत्पुरुषोंके धर्मकी निन्दा न करे। जो इस प्रकारके बर्तावसे सम्पन्न है, वह श्रेष्ठ मुनि कहलाता है॥ ५३ १/२॥ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च महाभूतानि पञ्च च॥ ५४॥ मनो बुद्धिरहंकारमव्यक्तं पुरुषं तथा। एतत् सर्वं प्रसंख्याय यथावत् तत्त्वनिश्चयात्॥ ५५॥ ततः स्वर्गमवाप्नोति विमुक्तः सर्वबन्धजैः। जो मनुष्य इन्द्रिय, उनके विषय, पञ्चमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष—इन सबका विचार करके इनके तत्त्वका यथावत् निश्चय कर लेता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है॥ ५४-५५ १/२॥ एतावदन्तवेलायां परिसंख्याय तत्त्ववित्॥ ५६॥ ध्यायेदेकान्तमास्थाय मुच्यतेऽथ निराश्रयः। निर्मुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो वायुराकाशगो यथा॥ ५७॥ क्षीणकोशो निरातङ्कस्तथेदं प्राप्नुयात् परम्॥ ५८॥ जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है॥ ५६—५८॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४६॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४६॥