महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1811, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न
ऋषय ऊचुः को वा स्विदिह धर्मानामनुष्ठेयतमो मतः । व्याहतामिव पश्यामो धर्मस्य विविधां गतिम् ॥ १ ॥ ऋषियोंने पूछा—ब्रह्मन्! इस जगत्में समस्त धर्मोंमें कौन-सा धर्म अनुष्ठान करनेके लिये सर्वोत्तम माना गया है, यह कहिये; क्योंकि हमें धर्मके विभिन्न मार्ग एक-दूसरेसे आहत हुए-से प्रतीत होते हैं ॥ १ ॥
ऊर्ध्वं देहाद् वदन्त्येके नैतदस्तीति चापरे । केचित् संशयितं सर्वं निःसंशयमथापरे ॥ २ ॥ कोई तो कहते हैं कि देहका नाश होनेके बाद धर्मका फल मिलेगा। दूसरे कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है। कितने ही लोग सब धर्मोंको संशययुक्त बताते हैं और दूसरे संशयरहित कहते हैं ॥ २ ॥
अनित्यं नित्यमित्येके नास्त्यस्तीत्यपि चापरे । एकरूपं द्विधेत्येके व्यामिश्रमिति चापरे ॥ ३ ॥ कोई कहते हैं कि धर्म अनित्य है और कोई उसे नित्य कहते हैं। दूसरे कहते हैं कि धर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। कोई कहते हैं कि अवश्य है। कोई कहते हैं कि एक ही धर्म दो प्रकारका है तथा कुछ लोग कहते हैं कि धर्म मिश्रित है ॥ ३ ॥
मन्यन्ते ब्राह्मणा एव ब्रह्मज्ञास्तत्त्वदर्शिनः । एकमेके पृथक् चान्ये बहुत्वमिति चापरे ॥ ४ ॥ वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता तत्त्वदर्शी ब्राह्मण लोग यह मानते हैं कि एक ब्रह्म ही है। अन्य कितने ही कहते हैं कि जीव और ईश्वर अलग-अलग हैं और दूसरे लोग सबकी सत्ता भिन्न और बहुत प्रकारसे मानते हैं ॥ ४ ॥
देशकालावुभौ केचिन्नैतदस्तीति चापरे । जटाजिनधराश्चान्ये मुण्डाः केचिदसंवृताः ॥ ५ ॥ कितने ही लोग देश और कालकी सत्ता मानते हैं। दूसरे लोग कहते हैं कि इनकी सत्ता नहीं है। कोई जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले हैं, कोई सिर मुँडाते हैं और कोई दिगम्बर रहते हैं ॥ ५ ॥
अस्नानं केचिदिच्छन्ति स्नानमप्यपरे जनाः । मन्यन्ते ब्राह्मणा देवा ब्रह्मज्ञास्तत्त्वदर्शिनः ॥ ६ ॥