भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1819, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1819

अलग-अलग स्थानपर पहुँचानेवाले हैं। संसारमें जिनके द्वारा जैसा कर्म किया गया है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥

यन्नैव गन्धिनो रस्यं न रूपस्पर्शशब्दवत् । मन्यन्ते मुनयो बुद्ध्या तत् प्रधानं प्रचक्षते ॥ ३२ ॥ जो गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्दसे युक्त नहीं है तथा मुनिलोग बुद्धिके द्वारा जिसका मनन करते हैं, वह 'प्रधान' कहलाता है ॥ ३२ ॥

तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान् । महत्प्रधानभूतस्य गुणोऽहंकार एव च ॥ ३३ ॥ प्रधानका दूसरा नाम अव्यक्त है। अव्यक्तका कार्य महत्तत्त्व है और प्रकृतिसे उत्पन्न महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है ॥ ३३ ॥

अहंकारात् तु सम्भूतो महाभूतकृतो गुणः । पृथक्त्वेन हि भूतानां विषया वै गुणाः स्मृताः ॥ ३४ ॥ अहंकारसे पञ्च महाभूतोंको प्रकट करनेवाले गुणकी उत्पत्ति हुई है। पञ्च महाभूतोंके कार्य हैं रूप, रस आदि विषय। वे पृथक्-पृथक् गुणोंके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ३४ ॥

बीजधर्म तथाव्यक्तं प्रसवात्मकमेव च । बीजधर्मा महानात्मा प्रसवश्चेति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥ अव्यक्त प्रकृति कारणरूपा भी है और कार्यरूपा भी। इसी प्रकार महत्तत्त्वके भी कारण और कार्य दोनों ही स्वरूप सुने गये हैं ॥ ३५ ॥

बीजधर्मस्त्वहंकारः प्रसवश्च पुनः पुनः । बीजप्रसवधर्माणि महाभूतानि पञ्च वै ॥ ३६ ॥ अहंकार भी कारणरूप तो है ही, कार्यरूपमें भी बारम्बार परिणत होता रहता है। पञ्च महाभूतों (पञ्चतन्मात्राओं)-में भी कारणत्व और कार्यत्व दोनों धर्म हैं। वे शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि वे बीजधर्मी हैं ॥ ३६ ॥

बीजधर्मिण इत्याहुः प्रसवं च प्रकुर्वते । विशेषाः पञ्चभूतानां तेषां चित्तं विशेषणम् ॥ ३७ ॥ उन पाँचो भूतोंके विशेष कार्य शब्द आदि विषय हैं। उन विषयोंका प्रवर्तक चित्त है ॥ ३७ ॥

तत्रैकगुणमाकाशं द्विगुणो वायुरुच्यते । त्रिगुणं ज्योतिरित्याहुरापश्चापि चतुर्गुणाः ॥ ३८ ॥ पञ्चमहाभूतोंमेंसे आकाशमें एक ही गुण माना गया है। वायुके दो गुण बतलाये जाते हैं। तेज तीन गुणोंसे युक्त कहा गया है। जलके चार गुण हैं ॥ ३८ ॥

पृथिवी पञ्चगुणा ज्ञेया चरस्थावरसंकुला । सर्वभूतकरी देवी शुभाशुभनिदर्शिनी ॥ ३९ ॥