भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1856, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1856

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना

जनमेजय उवाच

उत्तङ्कः केन तपसा संयुक्तो वै महामनाः ।
यः शापं दातुकामोऽभूद् विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! महात्मा उत्तंक मुनिने ऐसी कौन-सी तपस्या की थी, जिससे वे सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् विष्णुको भी शाप देनेका संकल्प कर बैठे? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

उत्तङ्को महता युक्तस्तपसा जनमेजय ।
गुरुभक्तः स तेजस्वी नान्यत् किंचिदपूजयत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! उत्तंक मुनि बड़े भारी तपस्वी, तेजस्वी और गुरुभक्त थे। उन्होंने जीवनमें गुरुके सिवा दूसरे किसी देवताकी आराधना नहीं की थी ॥ २ ॥

सर्वेषामृषिपुत्राणामेष आसीन्मनोरथः ।
औत्तङ्कीं गुरुवृत्तिं वै प्राप्नुयामेति भारत ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! जब वे गुरुकुलमें रहते थे, उन दिनों सभी ऋषिकुमारोंके मनमें यह अभिलाषा होती थी कि हमें भी उत्तंकके समान गुरुभक्ति प्राप्त हो ॥ ३ ॥

गौतमस्य तु शिष्याणां बहूनां जनमेजय ।
उत्तङ्केऽभ्यधिका प्रीतिः स्नेहश्चैवाभवत् तदा ॥ ४ ॥
जनमेजय! गौतमके बहुत-से शिष्य थे, परंतु उनका प्रेम और स्नेह सबसे अधिक उत्तंकमें ही था ॥

स तस्य दमशौचाभ्यां विक्रान्तेन च कर्मणा ।
सम्यक् चैवोपचारेण गौतमः प्रीतिमानभूत् ॥ ५ ॥
उत्तंकके इन्द्रियसंयम, बाहर-भीतरकी पवित्रता, पुरुषार्थ, कर्म और उत्तमोत्तम सेवासे गौतम बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ ५ ॥

अथ शिष्यसहस्राणि समनुज्ञातवानृषिः ।
उत्तङ्कं परया प्रीत्या नाभ्यनुज्ञातुमैच्छत ।