महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1879, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः स पूजितो नागैस्तदोत्तङ्कः प्रतापवान् । अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा जगाम गुरुसद्म तत् ।। ५७ ।। तदनन्तर नागोंसे सम्मानित होकर प्रतापी उत्तंक मुनि अग्निदेवकी प्रदक्षिणा करके गुरुके आश्रमकी ओर चल दिये ।। ५७ ।।
स गत्वा त्वरितो राजन् गौतमस्य निवेशनम् । प्रायच्छत् कुण्डले दिव्ये गुरुपत्न्यास्तदानघ ।। ५८ ।। निष्पाप नरेश! वहाँ गौतमके घरमें शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर उन्होंने गुरुपत्नीको वे दोनों दिव्य कुण्डल दे दिये ।। ५८ ।।
वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय । सर्वं शशंस गुरवे यथावद् द्विजसत्तमः ।। ५९ ।। जनमेजय! वासुकि आदि नागोंके यहाँ जो घटना घटी थी, उसका सारा समाचार द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने अपने गुरु महर्षि गौतमसे ठीक-ठीक कह सुनाया ।। ५९ ।।
एवं महात्मना तेन त्रींल्लोँकान् जनमेजय । परिक्रम्याहृते दिव्ये ततस्ते मणिकुण्डले ।। ६० ।। जनमेजय! इस प्रकार महात्मा उत्तंकने तीनों लोकोंमें घूमकर वे मणिमय दिव्य कुण्डल प्राप्त किये थे ।। ६० ।।
एवंप्रभावः स मुनिरुत्तङ्को भरतर्षभ । परेण तपसा युक्तो यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ६१ ।। भरतश्रेष्ठ! उत्तंक मुनि, जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे थे, ऐसे ही प्रभावशाली और महान् तपस्वी थे ।। ६१ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकका उपाख्यानविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५८ ।।