भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1899, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1899

प्रभावाद् वासुदेवस्य मम व्याहरणादपि । पाण्डवानामयं चान्ते पालयिष्यति मेदिनीम् ॥ १२ ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे और मेरे आशीर्वादसे वह पाण्डवोंके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन करेगा’ ॥ १२ ॥ धनंजयं च सम्प्रेक्ष्य धर्मराजस्य शृण्वतः । व्यासो वाक्यमुवाचेदं हर्षयन्निव भारत ॥ १३ ॥ भारत! तत्पश्चात् व्यासजीने धर्मराज युधिष्ठिरको सुनाते हुए अर्जुनकी ओर देखकर उनका हर्ष बढ़ाते हुए-से कहा— ॥ १३ ॥ पौत्रस्तव महाभागो जनिष्यति महामनाः । पृथ्वीं सागरपर्यन्तां पालयिष्यति धर्मतः ॥ १४ ॥ तस्माच्छोकं कुरुश्रेष्ठ जहि त्वमरिकर्शन । विचार्यमत्र न हि ते सत्यमेतद् भविष्यति ॥ १५ ॥ ‘कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें महान् भाग्यशाली और महामनस्वी पौत्र होनेवाला है, जो समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका धर्मतः पालन करेगा; अतः शत्रुसूदन! तुम शोक त्याग दो। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मेरा यह कथन सत्य होगा ॥ १४-१५ ॥