भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1962, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1962

राजन्! कुन्तीकुमार अर्जुन जब इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित हो गये, तब उनकी ऐसी अवस्था देख त्रिलोकी हाहाकार कर उठी और सूर्यदेवकी प्रभा फीकी पड़ गयी ॥ १४ ॥

ततो ववौ महाराज मारुतो लोमहर्षणः ।
राहुग्रसदादित्यं युगपत् सोममेव च ॥ १५ ॥
महाराज! उस समय रोंगटे खड़े कर देनेवाली प्रचण्ड वायु चलने लगी। राहुने एक ही समय सूर्य और चन्द्रमा दोनोंको ग्रस लिये ॥ १५ ॥

उल्काश्च जघ्निरे सूर्यं विकीर्यन्त्यः समन्ततः ।
वेपथुश्चाभवद् राजन् कैलासस्य महागिरेः ॥ १६ ॥
चारों ओर बिखरकर गिरती हुई उल्काएँ सूर्यसे टकराने लगीं। राजन्! उस समय महापर्वत कैलास भी काँपने लगा ॥ १६ ॥

मुमुचुः श्वासमत्युष्णं दुःखशोकसमन्विताः ।
सप्तर्षयो जातभयास्तथा देवर्षयोऽपि च ॥ १७ ॥
सप्तर्षियों और देवर्षियोंको भी भय होने लगा। वे दुःख और शोकसे संतप्त हो अत्यन्त गरम-गरम साँस छोड़ने लगे ॥ १७ ॥

शशं चाशु विनिर्भिद्य मण्डलं शशिनोऽपतत् ।
विपरीता दिशश्चापि सर्वा धूमाकुलास्तथा ॥ १८ ॥
पूर्वोक्त उल्काएँ चन्द्रमामें स्थित हुए शश-चिह्नका भेदन करके चन्द्रमण्डलके चारों ओर गिरने लगीं । सम्पूर्ण दिशाएँ धूमाच्छन्न होकर विपरीत प्रतीत होने लगीं ॥ १८ ॥

रासभारुणसंकाशा धनुष्मन्तः सविद्युतः ।
आवृत्य गगनं मेघा मुमुचुर्मांसशोणितम् ॥ १९ ॥
गधेके समान रंग और लाल रंगके सम्मिश्रणसे जो रंग हो सकता है, वैसे वर्णवाले मेघ आकाशको घेरकर रक्त और मांसकी वर्षा करने लगे। उनमें इन्द्रधनुषका भी दर्शन होता था और बिजलियाँ भी कौंधती थीं ॥ १९ ॥

एवमासीत् तदा वीरे शरवर्षेण संवृते ।
फाल्गुने भरतश्रेष्ठ तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वीर अर्जुनके उस समय शत्रुओंकी बाण-वर्षासे आच्छादित हो जानेपर ऐसे-ऐसे उत्पात प्रकट होने लगे। वह अद्भुत-सी बात हुई ॥ २० ॥

तस्य तेनावकीर्णस्य शरजालेन सर्वतः ।
मोहात् पपात गाण्डीवमावापश्च करादपि ॥ २१ ॥
उस बाणसमूहके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हुए अर्जुनपर मोह छा गया। उस समय उनके हाथसे गाण्डीव धनुष और दस्ताने गिर पड़े ॥ २१ ॥

तस्मिन् मोहमनुप्राप्ते शरजालं महत् तदा ।
सैन्धवा मुमुचुस्तूर्णं गतसत्त्वे महारथे ॥ २२ ॥