महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1963, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारथी अर्जुन जब मोहग्रस्त एवं अचेत हो गये, उस समय भी सिंधुदेशीय योद्धा उनपर वेगपूर्वक महान् बाणसमूहकी वर्षा करते रहे ॥ २२ ॥ ततो मोहसमापन्नं ज्ञात्वा पार्थं दिवौकसः । सर्वे वित्रस्तमनसस्तस्य शान्तिकृतोऽभवन् ॥ २३ ॥ अर्जुनको मोहके वशीभूत हुआ जान सम्पूर्ण देवता मन-ही-मन संत्रस्त हो गये और उनके लिये शान्तिका उपाय करने लगे ॥ २३ ॥ ततो देवर्षयः सर्वे तथा सप्तर्षयोऽपि च । ब्रह्मर्षयश्च विजयं जेपुः पार्थस्य धीमतः ॥ २४ ॥ फिर तो समस्त देवर्षि, सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मिलकर बुद्धिमान् अर्जुनकी विजयके लिये मन्त्र-जप करने लगे ॥ २४ ॥ ततः प्रदीपिते देवैः पार्थतेजसि पार्थिव । तस्थावचलवद् धीमान् संग्रामे परमास्त्रवित् ॥ २५ ॥ पृथ्वीनाथ! तदनन्तर देवताओंके प्रयत्नसे अर्जुनका तेज पुनः उद्दीप्त हो उठा और उत्तम अस्त्र-विद्याके ज्ञाता परम बुद्धिमान् धनंजय संग्रामभूमिमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हो गये ॥ २५ ॥ विचकर्ष धनुर्दिव्यं ततः कौरवनन्दनः । यन्त्रस्येवेह शब्दोऽभून्महांस्तस्य पुनः पुनः ॥ २६ ॥ फिर तो कौरवनन्दन अर्जुनने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची। उस समय उससे बार-बार मशीनकी तरह बड़े जोर-जोरसे टंकार-ध्वनि होने लगी ॥ २६ ॥ ततः स शरवर्षाणि प्रत्यमित्रान् प्रति प्रभुः । ववर्ष धनुषा पार्थो वर्षाणीव पुरंदरः ॥ २७ ॥ इसके बाद जैसे इन्द्र पानीकी वर्षा करते हैं, उसी तरह प्रभावशाली पार्थने अपने धनुषद्वारा शत्रुओंपर बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ २७ ॥ ततस्ते सैन्धवा योधाः सर्व एव सराजकाः । नादृश्यन्त शरैः कीर्णाः शलभैरिव पादपाः ॥ २८ ॥ फिर तो पार्थके बाणोंसे आच्छादित हो समस्त सैन्धव योद्धा टिड्डियोंसे ढँके हुए वृक्षोंकी भाँति अपने राजासहित अदृश्य हो गये ॥ २८ ॥ तस्य शब्देन वित्रेसुर्भयार्ताश्च विदुद्रुवुः । मुमुचुश्चाश्रु शोकार्ताः शुशुचुश्चापि सैन्धवाः ॥ २९ ॥ कितने ही गाण्डीवकी टंकार-ध्वनिसे ही थर्रा उठे। बहुतेरे भयसे व्याकुल होकर भाग गये और अनेक सैन्धव योद्धा शोकसे आतुर होकर आँसू बहाने एवं शोक करने लगे ॥ २९ ॥ तांस्तु सर्वान् नरव्याघ्रःसैन्धवान् व्यचरद् बली ।