महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1970, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीछे-पीछे युद्धके लिये यहाँतक आ पहुँचे हो तो वह पिताकी मृत्युके दुःखसे आतुर हो अपने प्राणोंका परित्याग कर बैठा है ।। २९-३० ।।
प्राप्तो बीभत्सुरित्येव नाम श्रुत्वैव तेऽनघ ।
विषादार्तः पपातोर्व्यां ममार च ममात्मजः ।। ३१ ।।
‘अनघ! ‘अर्जुन आये’ इन शब्दोंके साथ तुम्हारा नाममात्र सुनकर ही मेरा बेटा विषादसे पीड़ित हो पृथ्वीपर गिरा और मर गया ।। ३१ ।।
तं दृष्ट्वा पतितं तत्र ततस्तस्यात्मजं प्रभो ।
गृहीत्वा समनुप्राप्ता त्वामद्य शरणैषिणी ।। ३२ ।।
‘प्रभो! उसको ऐसी अवस्थामें पड़ा हुआ देख उसके पुत्रको साथ ले मैं शरण खोजती हुई आज तुम्हारे पास आयी हूँ’ ।। ३२ ।।
इत्युक्त्वाऽऽर्तस्वरं सा तु मुमोच धृतराष्ट्रजा ।
दीना दीनं स्थितं पार्थमब्रवीच्चाप्यधोमुखम् ।। ३३ ।।
ऐसा कहकर धृतराष्ट्र-पुत्री दुःशला दीन होकर आर्तस्वरसे विलाप करने लगी। उसकी दीनदशा देख अर्जुन भी दीन भावसे अपना मुँह नीचे किये खड़े रहे। उस समय दुःशला उनसे फिर बोली— ।। ३३ ।।
स्वसारं समवेक्षस्व स्वस्त्रीयात्मजमेव च ।
कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ दयां कुरु कुलोद्वह ।। ३४ ।।
‘भैया! तुम कुरुकुलमें श्रेष्ठ और धर्मको जाननेवाले हो, अतः दया करो। अपनी इस दुखिया बहिनकी ओर देखो और भानजेके बेटेपर भी कृपादृष्टि करो ।। ३४ ।।
विस्मृत्य कुरुराजानं तं च मन्दं जयद्रथम् ।
अभिमन्योर्यथा जातः परिक्षित् परवीरहा ।। ३५ ।।
तथायं सुरथाज्जातो मम पौत्रो महाभुजः ।
‘मन्दबुद्धि दुर्योधन और जयद्रथको भूलकर हमें अपनाओ। जैसे अभिमन्युसे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले परीक्षित्का जन्म हुआ है, उसी प्रकार सुरथसे यह मेरा महाबाहु पौत्र उत्पन्न हुआ है ।। ३५ १/२ ।।
तमादाय नरव्याघ्र सम्प्राप्तास्मि तवान्तिकम् ।। ३६ ।।
शमार्थं सर्वयोधानां शृणु चेदं वचो मम ।
‘पुरुषसिंह! मैं इसीको लेकर समस्त योद्धाओंको शान्त करनेके लिये आज तुम्हारे पास आयी हूँ। तुम मेरी यह बात सुनो ।। ३६ १/२ ।।
आगतोऽयं महाबाहो तस्य मन्दस्य पुत्रकः ।। ३७ ।।
प्रसादमस्य बालस्य तस्मात् त्वं कर्तुमर्हसि ।
‘महाबाहो! यह उस मन्दबुद्धि जयद्रथका पौत्र तुम्हारी शरणमें आया है। अतः इस बालकपर तुम्हें कृपा करनी चाहिये ।। ३७ १/२ ।।