महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2308, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः स विदुरं धीमान् वाक्यमाह युधिष्ठिरः । भीमसेने न कोपं स नृपतिः कर्तुमर्हति ॥ ७ ॥ तब बुद्धिमान् युधिष्ठिरने विदुरसे कहा—'चाचाजी! राजा धृतराष्ट्रको भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥ परिक्लिष्टो हि भीमोऽपि हिमवृष्ट्यातपादिभिः । दुःखैर्बहुविधैर्धीमानरण्ये विदितं तव ॥ ८ ॥ 'आपको तो मालूम ही है कि वनमें हिम, वर्षा और धूप आदि नाना प्रकारके दुःखोंसे बुद्धिमान् भीमसेनको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा है ॥ ८ ॥ किं तु मद्वचनाद् ब्रूहि राजानं भरतर्षभ । यद् यदिच्छसि यावच्च गृह्यतां मद्गृहादिति ॥ ९ ॥ 'आप मेरी ओरसे राजा धृतराष्ट्रसे कहिये कि भरतश्रेष्ठ! आप जो-जो वस्तु जितनी मात्रामें लेना चाहते हों, उसे मेरे घरसे ग्रहण कीजिये' ॥ ९ ॥ यन्मात्सर्यमयं भीमः करोति भृशदुःखितः । न तन्मनसि कर्तव्यमिति वाच्यः स पार्थिवः ॥ १० ॥ 'भीमसेन अत्यन्त दुखी होनेके कारण जो कभी ईर्ष्या प्रकट करते हैं, उसे वे मनमें न लावें। यह बात आप महाराजसे अवश्य कह दीजियेगा' ॥ १० ॥ यन्ममास्ति धनं किंचिदर्जुनस्य च वेश्मनि । तस्य स्वामी महाराज इति वाच्यः स पार्थिवः ॥ ११ ॥ 'मेरे और अर्जुनके घरमें जो कुछ भी धन है, उस सबके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र हैं; यह बात उन्हें बता दीजिये ॥ ११ ॥ ददातु राजा विप्रेभ्यो यथेष्टं क्रियतां व्ययः । पुत्राणां सुहृदां चैव गच्छत्वानृण्यमद्य सः ॥ १२ ॥ 'वे ब्राह्मणोंको यथेष्ट धन दें। जितना खर्च करना चाहें, करें। आज वे अपने पुत्रों और सुहृदोंके ऋणसे मुक्त हो जायँ ॥ १२ ॥ इदं चापि शरीरं मे तवायत्तं जनाधिप । धनानि चेति विद्धि त्वं न मे तत्रास्ति संशयः ॥ १३ ॥ 'उनसे कहिये, जनेश्वर! मेरा यह शरीर और सारा धन आपके ही अधीन है। इस बातको आप अच्छी तरह जान लें। इस विषयमें मेरे मनमें संशय नहीं है' ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि युधिष्ठिरानुमोदने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिरका अनुमोदनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥