महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2352, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतैराख्यातेन मार्गेण ततस्ते जग्मुरञ्जसा । ददृशुश्चाविदूरे तान् सर्वानथ पदातयः ॥ ७ ॥ यह सुनकर उन्हींके बताये हुए मार्गसे वे सब-के-सब पैदल ही यमुनातटकी ओर चल दिये। कुछ ही दूर जानेपर उन्होंने उन सब लोगोंको वहाँसे आते देखा ॥ ७ ॥
ततस्ते सत्वरा जग्मुः पितुर्दर्शनकाङ्क्षिणः । सहदेवस्तु वेगेन प्राधावद् यत्र सा पृथा ॥ ८ ॥ सुस्वरं रुरुदे धीमान् मातुः पादावुपस्पृशन् । फिर तो समस्त पाण्डव अपने ताऊके दर्शनकी इच्छासे बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़े। बुद्धिमान् सहदेव तो बड़े वेगसे दौड़े और जहाँ कुन्ती थी, वहाँ पहुँचकर माताके दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ८ १/२ ॥
सा च बाष्पाकुलमुखी ददर्श दयितं सुतम् ॥ ९ ॥ बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य समुन्नाम्य च पुत्रकम् । गान्धार्याः कथयामास सहदेवमुपस्थितम् ॥ १० ॥ अनन्तरं च राजानं भीमसेनमतार्जुनम् । नकुलं च पृथा दृष्ट्वा त्वरमाणोपचक्रमे ॥ ११ ॥ कुन्तीने भी जब अपने प्यारे पुत्र सहदेवको देखा तो उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। उन्होंने दोनों हाथोंसे पुत्रको उठाकर छातीसे लगा लिया और गान्धारीसे कहा—‘दीदी! सहदेव आपकी सेवामें उपस्थित है’। तदनन्तर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुलको देखकर कुन्तीदेवी बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर चलीं ॥ ९—११ ॥
सा ह्याग्रे गच्छति तयोर्दम्पत्योर्हतपुत्रयोः । कर्षन्ती तौ ततस्ते तां दृष्ट्वा संन्यपतन् भुवि ॥ १२ ॥ वे आगे-आगे चलती थीं और उन पुत्रहीन दम्पतिको अपने साथ खींचे लाती थीं। उन्हें देखते ही पाण्डव उनके चरणोंमें पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥
राजा तान् स्वरयोगेन स्पर्शेन च महामनाः । प्रत्यभिज्ञाय मेधावी समाश्वासयत प्रभुः ॥ १३ ॥ महामना बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने बोलनेके स्वरसे और स्पर्शसे पाण्डवोंको पहचानकर उन सबको आश्वासन दिया ॥ १३ ॥
ततस्ते बाष्पमुत्सृज्य गान्धारीसहितं नृपम् । उपतस्थुर्महात्मानो मातरं च यथाविधि ॥ १४ ॥ तत्पश्चात् अपने नेत्रोंके आँसू पोंछकर महात्मा पाण्डवोंने गान्धारीसहित राजा धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीको विधिपूर्वक प्रणाम किया ॥ १४ ॥
सर्वेषां तोयकलशान् जगृहुस्ते स्वयं तदा । पाण्डवा लब्धसंज्ञास्ते मात्रा चाश्वासिताः पुनः ॥ १५ ॥