महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2365, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राणान् प्राणेषु च दधदिन्द्रियाणीन्द्रियेषु च ॥ २६ ॥ बुद्धिमान् विदुर अपने शरीरको युधिष्ठिरके शरीरमें, प्राणोंको प्राणोंमें और इन्द्रियोंको उनकी इन्द्रियोंमें स्थापित करके उनके भीतर समा गये ॥ २६ ॥
स योगबलमास्थाय विवेश नृपतेस्तनुम् । विदुरो धर्मराजस्य तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ २७ ॥ उस समय विदुरजी तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्होंने योगबलका आश्रय लेकर धर्मराज युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश किया ॥ २७ ॥
विदुरस्य शरीरं तु तथैव स्तब्धलोचनम् । वृक्षाश्रितं तदा राजा ददर्श गतचेतनम् ॥ २८ ॥ राजाने देखा, विदुरजीका शरीर पूर्ववत् वृक्षके सहारे खड़ा है। उनकी आँखें अब भी उसी तरह निर्निमेष हैं, किंतु अब उनके शरीरमें चेतना नहीं रह गयी है ॥ २८ ॥
बलवन्तं तथाऽऽत्मानं मेने बहुगुणं तदा । धर्मराजो महातेजास्तच्च सस्मार पाण्डवः ॥ २९ ॥ पौराणमात्मनः सर्वं विद्यावान् स विशाम्पते । योगधर्मं महातेजा व्यासेन कथितं यथा ॥ ३० ॥ इसके विपरीत उन्होंने अपनेमें विशेष बल और अधिक गुणोंका अनुमान किया। प्रजानाथ! इसके बाद महातेजस्वी पाण्डुपुत्र विद्यावान् धर्मराज युधिष्ठिरने अपने समस्त पुरातन स्वरूपका स्मरण किया। (मैं और विदुरजी एक ही धर्मके अंशसे प्रकट हुए थे, इस बातका अनुभव किया)। इतना ही नहीं, उन महातेजस्वी नरेशने व्यासजीके बताये हुए योगधर्मका भी स्मरण कर लिया ॥ २९-३० ॥
धर्मराजश्च तत्रैव संस्कारयिषुस्तदा । दग्धुकामोऽभवद् विद्वानथ वागभ्यभाषत ॥ ३१ ॥ भो भो राजन्न दग्धव्यमेतद् विदुरसंज्ञकम् । कलेवरमिहैवं ते धर्म एष सनातनः ॥ ३२ ॥ लोकाः सान्तानिका नाम भविष्यन्त्यस्य भारत । यतिधर्ममवाप्तोऽसौ नैष शोच्यः परंतप ॥ ३३ ॥ अब विद्वान् धर्मराजने वहीं विदुरके शरीरका दाह-संस्कार करनेका विचार किया। इतनेहीमें आकाशवाणी हुई—‘राजन्! शत्रुसंतापी भरतनन्दन! इस विदुर नामक शरीरका यहाँ दाह-संस्कार करना उचित नहीं है; क्योंकि वे संन्यास-धर्मका पालन करते थे। यहाँ उनका दाह न करना ही तुम्हारे लिये सनातन धर्म है। विदुरजीको सान्तानिक नामक लोकोंकी प्राप्ति होगी; अतः उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये’ ॥ ३१—३३ ॥
इत्युक्तो धर्मराजः स विनिवृत्य ततः पुनः । राज्ञो वैचित्रवीर्यस्य तत् सर्वं प्रत्यवेदयत् ॥ ३४ ॥