भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2368, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2368

कृताभिषेकैर्मुनिभिर्हुताग्निभिरुपस्थिताः ॥ ७ ॥ वानेयपुष्पनिकरैराज्यधूमोद्गमैरपि । ब्राह्मेण वपुषा युक्ता युक्ता मुनिगणस्य ताः ॥ ८ ॥ उन्होंने देखा, वहाँ आश्रमोंमें यज्ञकी वेदियाँ बनी हैं, जिनपर अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे हैं। मुनिलोग स्नान करके उन वेदियोंके पास बैठे हैं और अग्निमें आहुति दे रहे हैं। वनके फूलों और घृतकी आहुतिसे उठे हुए धूमोंसे भी उन वेदियोंकी शोभा हो रही है। वहाँ निरन्तर वेदध्वनि होनेके कारण मानो वे वेदियाँ वेदमय शरीरसे संयुक्त जान पड़ती थीं। मुनियोंके समुदाय सदा उनसे सम्पर्क बनाये रखते थे ॥ ७-८ ॥ मृगयूथैरनुद्विग्नैस्तत्र तत्र समाश्रितैः । अशङ्कितैः पक्षिगणैः प्रगीतैरिव च प्रभो ॥ ९ ॥ प्रभो! उन आश्रमोंमें जहाँ-तहाँ मृगोंके झुंड निर्भय एवं शान्तचित्त होकर आरामसे बैठे थे। पक्षियोंके समुदाय निःशंक होकर उच्च स्वरसे कलरव करते थे ॥ केकाभिर्नीलकण्ठानां दात्यूहानां च कूजितैः । कोकिलानां कुहुरवैः सुखैः श्रुतिमनोहरैः ॥ १० ॥ प्राधीतद्विजघोषैश्च क्वचित् क्वचिदलंकृतम् । फलमूलसमाहारैर्महद्भिश्चोपशोभितम् ॥ ११ ॥ मोरोंके मधुर केकारव, दात्यूह नामक पक्षियोंके कल-कूजन और कोयलोंकी कुहू-कुहू ध्वनि हो रही थी। उनके शब्द बड़े ही सुखद तथा कानों और मनको हर लेनेवाले थे। कहीं-कहीं स्वाध्यायशील ब्राह्मणोंके वेद-मन्त्रोंका गम्भीर घोष गूँज रहा था और इन सबके कारण उन आश्रमोंकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी एवं वह आश्रम फल-मूलका आहार करनेवाले महापुरुषोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ १०-११ ॥ ततः स राजा प्रददौ तापसार्थमुपाहृतान् । कलशान् काञ्चनान् राजंस्तथैवौदुम्बरानपि ॥ १२ ॥ अजिनानि प्रवेणीश्च स्रुक् स्रुवं च महीपतिः । कमण्डलूंश्च स्थालीश्च पिठराणि च भारत ॥ १३ ॥ भाजनानि च लौहानि पात्रीश्च विविधा नृप । यद् यदिच्छति यावच्च यच्चान्यदपि भाजनम् ॥ १४ ॥ राजन्! उस समय राजा युधिष्ठिरने तपस्वियोंके लिये लाये हुए सोने और ताँबेके कलश, मृगचर्म, कम्बल, स्रुक्, सुवा, कमण्डलु, बटलोई, कड़ाही, अन्यान्य लोहेके बने हुए पात्र तथा और भी भाँति-भाँतिके बर्तन बाँटे। जो जितना और जो-जो बर्तन चाहता था, उसको उतना ही और वही बर्तन दिया जाता था। दूसरा भी आवश्यक पात्र दे दिया जाता था ॥ १२—१४ ॥ एवं स राजा धर्मात्मा परीत्याश्रममण्डलम् ।