महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2371, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः
महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना
वैशम्पायन उवाच
ततः समुपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
व्यासः सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर महात्मा पाण्डवोंके बैठ जानेपर सत्यवतीनन्दन व्यासने इस प्रकार पूछा ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र महाबाहो कच्चित् ते वर्धते तपः ।
कच्चिन्मनस्ते प्रीणाति वनवासे नराधिप ॥ २ ॥
‘महाबाहु धृतराष्ट्र! तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है न? नरेश्वर! वनवासमें तुम्हारा मन तो लगता है न? ॥ २ ॥
कच्चिद् हृदि न ते शोको राजन् पुत्रविनाशजः ।
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि सुप्रसन्नानि तेऽनघ ॥ ३ ॥
‘राजन्! अब कभी तुम्हारे मनमें अपने पुत्रोंके मारे जानेका शोक तो नहीं होता? निष्पाप नरेश! तुम्हारी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ निर्मल तो हो गयी हैं न? ॥ ३ ॥
कच्चिद् बुद्धिंदृढां कृत्वा चरस्यारण्यकं विधिम् ।
कच्चिद् वधूश्च गान्धारी न शोकेनाभिभूयते ॥ ४ ॥
‘क्या तुम अपनी बुद्धिको दृढ़ करके वनवासके कठोर नियमोंका पालन करते हो? बहू गान्धारी कभी शोकके वशीभूत तो नहीं होती? ॥ ४ ॥
महाप्रज्ञा बुद्धिमती देवी धर्मार्थदर्शिनी ।
आगमापायतत्त्वज्ञा कच्चिदेषा न शोचति ॥ ५ ॥
‘गान्धारी बड़ी बुद्धिमती और महाविदुषी है। यह देवी धर्म और अर्थको समझनेवाली तथा जन्म-मरणके तत्त्वको जाननेवाली है। इसे तो कभी शोक नहीं होता ॥ ५ ॥
कच्चित् कुन्ती च राजंस्त्वां शुश्रूषत्यनहंकृता ।
या परित्यज्य स्वं पुत्रं गुरुशुश्रूषणे रता ॥ ६ ॥
‘राजन्! जो अपने पुत्रोंको त्यागकर गुरुजनोंकी सेवामें लगी हुई है, वह कुन्ती क्या अहंकारशून्य होकर तुम्हारी सेवा-शुश्रूषा करती है? ॥ ६ ॥
कच्चिद् धर्मसुतो राजा त्वया प्रत्यभिनन्दितः ।