भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2420, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2420

‘संजय! हमलोग स्वयं गृहस्थाश्रमका परित्याग करके चले आये हैं, अतः हमारे लिये इस तरहकी मृत्यु अनिष्टकारक नहीं हो सकती। जल, अग्नि तथा वायुके संयोगसे अथवा उपवास करके प्राण त्यागना तपस्वियोंके लिये प्रशंसनीय माना गया है; इसलिये अब तुम शीघ्र यहाँसे चले जाओ। विलम्ब न करो’॥ २७½॥ इत्युक्त्वा संजयं राजा समाधाय मनस्तथा ॥ २८ ॥ प्राङ्मुखः सह गान्धार्या कुन्त्या चोपाविशत् तदा । संजयसे ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने मनको एकाग्र किया और गान्धारी तथा कुन्तीके साथ वे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये॥ २८½॥ संजयस्तं तथा दृष्ट्वा प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ २९ ॥ उवाच चैनं मेधावी युङ्क्ष्वात्मानमिति प्रभो । उन्हें उस अवस्थामें देख मेधावी संजयने उनकी परिक्रमा की और कहा—‘महाराज! अब अपनेको योगयुक्त कीजिये॥ २९½॥ ऋषिपुत्रो मनीषी स राजा चक्रेऽस्य तद् वचः ॥ ३० ॥ सन्निरुध्येन्द्रियग्राममासीत् काष्ठोपमस्तदा । महर्षि व्यासके पुत्र मनीषी राजा धृतराष्ट्रने संजयकी वह बात मान ली। वे इन्द्रियसमुदायको रोककर काष्ठकी भाँति निश्चेष्ट हो गये॥ ३०½॥