महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2460, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः
अर्जुनका द्वारकामें आना और द्वारका तथा श्रीकृष्ण-पत्नियोंकी दशा देखकर दुखी होना
वैशम्पायन उवाच
दारुकोऽपि कुरून् गत्वा दृष्ट्वा पार्थान् महारथान् । आचष्ट मौसले वृष्णीनन्योन्येनोपसंहृतान् ॥ १ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! दारुकने भी कुरुदेशमें जाकर महारथी कुन्तीकुमारोंका दर्शन किया और उन्हें यह बताया कि समस्त वृष्णिवंशी मौसलयुद्धमें एक-दूसरेके द्वारा मार डाले गये ॥ १ ॥
श्रुत्वा विनष्टान् वार्ष्णेयान् सभोजान्धककौकुरान् । पाण्डवाः शोकसंतप्ता वित्रस्तमनसोऽभवन् ॥ २ ॥ वृष्णि, भोज, अन्धक और कुकुरवंशके वीरोंका विनाश हुआ सुनकर समस्त पाण्डव शोकसे संतप्त हो उठे। वे मन-ही-मन संत्रस्त हो गये ॥ २ ॥
ततोऽर्जुनस्तानामन्र्त्य केशवस्य प्रियः सखा । प्रययौ मातुलं द्रष्टुं नेदमस्तीति चाब्रवीत् ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् श्रीकृष्णके प्रिय सखा अर्जुन अपने भाइयोंसे पूछकर मामासे मिलनेके लिये चल दिये और बोले—'ऐसा नहीं हुआ होगा (समस्त यदुवंशियोंका एक साथ विनाश असम्भव है)' ॥ ३ ॥
स वृष्टिनिलयं गत्वा दारुकेण सह प्रभो । ददर्श द्वारकां वीरो मृतनाथामिव स्त्रियम् ॥ ४ ॥ प्रभो! दारुकके साथ वृष्णियोंके निवासस्थानपर पहुँचकर वीर अर्जुनने देखा कि द्वारका नगरी विधवा स्त्रीकी भाँति श्रीहीन हो गयी है ॥ ४ ॥
याः स्म ता लोकनाथेन नाथवत्यः पुराभवन् । तास्त्वनाथास्तदा नाथं पार्थं दृष्ट्वा विचुक्रुशुः ॥ ५ ॥ षोडशस्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रहः । पूर्वकालमें लोकनाथ श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित होनेके कारण जो सबसे अधिक सनाथा थीं, वे ही भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार अनाथा स्त्रियाँ अर्जुनको रक्षकके रूपमें आया देख उच्चस्वरसे करुण क्रन्दन करने लगीं ॥
तासामासीन्महान् नादो दृष्ट्वैवार्जुनमागतम् ॥ ६ ॥ तास्तु दृष्ट्वैव कौरव्यो बाष्पेणापिहितेक्षणः ।