भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2514, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2514

वहाँ यत्र-तत्र बहुत-से मुर्दे बिखरे पड़े थे, उनमेंसे किसीके शरीरसे रुधिर और मेद बहते थे, किसीके बाहु, ऊरु, पेट और हाथ-पैर कट गये थे ।।

स तत्कुणपदुर्गन्धमशिवं लोमहर्षणम् । जगाम राजा धर्मात्मा मध्ये बहु विचिन्तयन् ॥ २२ ॥ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत चिन्ता करते हुए उसी मार्गके बीचसे होकर निकले जहाँ सड़े मुर्दोंकी बदबू फैल रही थी और अमंगलकारी बीभत्स दृश्य दिखायी देता था। वह भयंकर मार्ग रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। २२ ।। ददर्शोष्णोदकैः पूर्णां नदीं चापि सुदुर्गमाम् । असिपत्रवनं चैव निशितं क्षुरसंवृतम् ॥ २३ ॥ आगे जाकर उन्होंने देखा, खौलते हुए पानीसे भरी हुई एक नदी बह रही है, जिसके पार जाना बहुत ही कठिन है। दूसरी ओर तीखी तलवारों या छूरोंके-से पत्तोंसे परिपूर्ण तेज धारवाला असिपत्र नामक वन है ।। २३ ।। करम्भवालुकास्तप्ता आयसीश्च शिलाःपृथक् । लोहकुम्भीश्च तैलस्य क्वाथ्यमानाः समन्ततः ॥ २४ ॥