भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2525, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2525

‘महाप्राज्ञ नरेश! मेरे पुत्र! तुम्हारे धर्मविषयक अनुराग, सत्यभाषण, क्षमा और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ॥ ३१॥
एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन् कृता मया।
न शक्यसे चालयितुं स्वभावात् पार्थ हेतुतः॥ ३२॥
‘राजन्! यह मैंने तीसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। पार्थ! किसी भी युक्तिसे कोई तुम्हें अपने स्वभावसे विचलित नहीं कर सकता॥ ३२॥
पूर्वं परीक्षितो हि त्वं प्रश्नाद् द्वैतवने मया।
अरणीसहितस्यार्थे तच्च निस्तीर्णवानसि॥ ३३॥
‘द्वैतवनमें अरणिकाष्ठका अपहरण करनेके पश्चात् जब यक्षके रूपमें मैंने तुमसे कई प्रश्न किये थे वह मेरे द्वारा तुम्हारी पहली परीक्षा थी। उसमें तुम भलीभाँति उत्तीर्ण हो गये॥ ३३॥
सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्या तत्र भारत।
श्वरूपधारिणा तत्र पुनस्त्वं मे परीक्षितः॥ ३४॥
‘भारत! फिर द्रौपदीसहित तुम्हारे सभी भाइयोंकी मृत्यु हो जानेपर कुत्तेका रूप धारण करके मैंने दूसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। उसमें भी तुम सफल हुए॥ ३४॥
इदं तृतीयं भ्रातॄणामर्थे यत् स्थातुमिच्छसि।
विशुद्धोऽसि महाभाग सुखी विगतकल्मषः॥ ३५॥
‘अब यह तुम्हारी परीक्षाका तीसरा अवसर था; किंतु इस बार भी तुम अपने सुखकी परवा न करके भाइयोंके हितके लिये नरकमें रहना चाहते थे, अतः महाभाग! तुम इस तरहसे शुद्ध प्रमाणित हुए। तुममें पापका नाम भी नहीं है; अतः सुखी होओ॥ ३५॥
न च ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशाम्पते।
मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता॥ ३६॥
‘पार्थ! प्रजानाथ! तुम्हारे भाई नरकमें रहनेके योग्य नहीं हैं। तुमने जो उन्हें नरक भोगते देखा है वह देवराज इन्द्रद्वारा प्रकट की हुई माया थी॥ ३६॥
अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्याः सर्वराजभिः।
ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्तं दुःखमुत्तमम्॥ ३७॥
‘तात! समस्त राजाओंको नरकका दर्शन अवश्य करना पड़ता है; इसलिये तुमने दो घड़ीतक यह महान् दुःख प्राप्त किया है॥ ३७॥
न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ।
कर्णो वा सत्यवाक् शूरो नरकार्हांश्चिरं नृप॥ ३८॥
‘नरेश्वर! सव्यसाची अर्जुन, भीमसेन, पुरुषप्रवर नकुल-सहदेव अथवा सत्यवादी शूरवीर कर्ण—इनमेंसे कोई भी चिरकालतक नरकमें रहनेके योग्य नहीं है॥
न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा कथंचन।