महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमृत्युमें कारण हुआ है ।। ७६ ।। तस्मिंस्तथा ब्रुवाणे तु ब्राह्मणी गौतमी नृप । स्वकर्मप्रत्ययाँल्लोकान् मत्वार्जुनकमब्रवीत् ।। ७७ ।। नरेश्वर! कालके इस प्रकार कहनेपर गौतमी ब्राह्मणीको यह निश्चय हो गया कि मनुष्यको अपने कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है। फिर वह अर्जुनकसे बोली ।।
गौतम्युवाच
नैव कालो न भुजगो न मृत्युरिह कारणम् । स्वकर्मभिरयं बालः कालेन निधनं गतः ।। ७८ ।। गौतमीने कहा—व्याध! न यह काल, न सर्प और न मृत्यु ही यहाँ कारण हैं। यह बालक अपने कर्मोंसे ही प्रेरित हो कालके द्वारा विनाशको प्राप्त हुआ है ।। ७८ ।।
मया च तत् कृतं कर्म येनायं मे मृतः सुतः । यातु कालस्तथा मृत्युर्मुञ्चार्जुनक पन्नगम् ।। ७९ ।। अर्जुनक! मैंने भी वैसा कर्म किया था जिससे मेरा पुत्र मर गया है। अतः काल और मृत्यु अपने-अपने स्थानको पधारें; और तू इस सर्पको छोड़ दे ।। ७९ ।।
भीष्म उवाच
ततो यथागतं जग्मुर्मृत्युः कालोऽथ पन्नगः । अभूद् विशोकोऽर्जुनको विशोका चैव गौतमी ।। ८० ।। भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर काल, मृत्यु और सर्प जैसे आये थे वैसे ही चले गये; और अर्जुनक तथा गौतमी ब्राह्मणीका भी शोक दूर हो गया ।।
एतत् श्रुत्वा शमं गच्छ मा भूः शोकपरो नृप । स्वकर्मप्रत्ययाँल्लोकान् सर्वे गच्छन्ति वै नृप ।। ८१ ।। नरेश्वर! इस उपाख्यानको सुनकर तुम शान्ति धारण करो, शोकमें न पड़ो। सब मनुष्य अपने-अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाले लोकोंमें ही जाते हैं ।।
नैव त्वया कृतं कर्म नापि दुर्योधनेन वै । कालेनैतत् कृतं विद्धि निहता येन पार्थिवाः ।। ८२ ।। तुमने या दुर्योधनने कुछ नहीं किया है। कालकी ही यह सारी करतूत समझो, जिससे समस्त भूपाल मारे गये हैं ।। ८२ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्येतद् वचनं श्रुत्व बभूव विगतज्वरः । युधिष्ठिरो महातेजाः पप्रच्छेदं च धर्मवित् ।। ८३ ।।