भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 381

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः

मतङ्गकी तपस्या और इन्द्रका उसे वरदान देना

भीष्म उवाच

एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः ।
सहस्रमेकपादेन ततो ध्याने व्यतिष्ठत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इन्द्रके ऐसा कहनेपर मतंग अपने मनको और भी दृढ़ और संयमशील बनाकर एक हजार वर्षोंतक एक पैरसे ध्यान लगाये खड़ा रहा ॥ १ ॥

तं सहस्रावरे काले शक्रो द्रष्टुमुपागमत् ।
तदेव च पुनर्वाक्यमुवाच बलवृत्रहा ॥ २ ॥
जब एक हजार वर्ष पूरे होनेमें कुछ ही बाकी था, उस समय बल और वृत्रासुरके शत्रु देवराज इन्द्र फिर मतंगको देखनेके लिये आये और पुनः उससे उन्होंने पहलेकी कही हुई बात ही दोहरायी ॥ २ ॥

मतङ्ग उवाच

इदं वर्षसहस्रं वै ब्रह्मचारी समाहितः ।
अतिष्ठमेकपादेन ब्राह्मण्यं नाप्नुयां कथम् ॥ ३ ॥
**मतंगने कहा—**देवराज! मैंने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो एक हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तप किया है। फिर मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं प्राप्त हो सकता? ॥ ३ ॥

शक्र उवाच

चण्डालयोनौ जातेन नावाप्यं वै कथंचन ।
अन्यं कामं वृणीष्व त्वं मा वृथा तेऽस्त्वयं श्रमः ॥ ४ ॥
**इन्द्रने कहा—**मतंग! चाण्डालकी योनिमें जन्म लेनेवालेको किसी तरह ब्राह्मणत्व नहीं मिल सकता; इसलिये तुम दूसरी कोई अभीष्ट वस्तु माँग लो। जिससे तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ न जाय ॥ ४ ॥

एवमुक्तो मतङ्गस्तु भृशं शोकपरायणः ।
अध्यतिष्ठद् गयां गत्वा सोंऽगुष्ठेन शतं समाः ॥ ५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर मतंग अत्यन्त शोकमग्न हो गयामें जाकर अंगूठेके बलपर सौ वर्षोंतक खड़ा रहा ॥ ५ ॥

सुदुर्वहं वहन् योगं कृशो धमनिसंततः ।
त्वगस्थिभूतो धर्मात्मा स पपातेति नः श्रुतम् ॥ ६ ॥