भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 455

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना

भीष्म उवाच

विपुलस्त्वकरोत् तीव्रं तपः कृत्वा गुरोर्वचः ।
तपोयुक्तमथात्मानममन्यत स वीर्यवान् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! विपुलने गुरुकी आज्ञाका पालन करके बड़ी कठोर तपस्या की। इससे उनकी शक्ति बहुत बढ़ गयी और वे अपनेको बड़ा भारी तपस्वी मानने लगे ॥ १ ॥

स तेन कर्मणा स्पर्धन् पृथिवीं पृथिवीपते ।
चचार गतभीः प्रीतो लब्धकीर्तिर्वरो नृप ॥ २ ॥
पृथ्वीनाथ! विपुल उस तपस्याद्वारा मन-ही-मन गर्वका अनुभव करके दूसरोंसे स्पर्धा रखने लगे। नरेश्वर! उन्हें गुरुसे कीर्ति और वरदान दोनों प्राप्त हो चुके थे; अतः वे निर्भय एवं संतुष्ट होकर पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ २ ॥

उभौ लोकौ जितौ चापि तथैवामन्यत प्रभुः ।
कर्मणा तेन कौरव्य तपसा विपुलेन च ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! शक्तिशाली विपुल उस गुरुपत्नी-संरक्षणरूपी कर्म तथा प्रचुर तपस्याद्वारा ऐसा समझने लगे कि मैंने दोनों लोक जीत लिये ॥ ३ ॥

अथ काले व्यतिक्रान्ते कस्मिंश्चित् कुरुनन्दन ।
रुच्या भगिन्या आदानं प्रभूतधनधान्यवत् ॥ ४ ॥
कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! तदनन्तर कुछ समय बीत जानेपर गुरुपत्नी रुचिकी बड़ी बहिनके यहाँ विवाहोत्सवका अवसर उपस्थित हुआ, जिसमें प्रचुर धन-धान्यका व्यय होनेवाला था ॥ ४ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु दिव्या काचिद् वराङ्गना ।
बिभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहायसा ॥ ५ ॥
उन्हीं दिनों एक दिव्य लोककी सुन्दरी दिव्यांगना परम मनोहर रूप धारण किये आकाशमार्गसे कहीं जा रही थी ॥ ५ ॥

तस्याः शरीरात् पुष्पाणि पतितानि महीतले ।
तस्याश्रमस्याविदूरे दिव्यगन्धानि भारत ॥ ६ ॥