भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 2566 में से

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

ब्राह्मण आदि वर्णोंकी दायभाग-विधिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

सर्वशास्त्रविधानज्ञ राजधर्मविदुत्तम ।
अतीव संशयच्छेत्ता भवान् वै प्रथितः क्षितौ ॥ १ ॥
कश्चित्तु संशयो मेऽस्ति तन्मे ब्रूहि पितामह ।
जातेऽस्मिन् संशये राजन् नान्यं पृच्छेम कंचन ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधानके ज्ञाता तथा राजधर्मके विद्वानोंमें श्रेष्ठ पितामह! आप इस भूमण्डलमें सम्पूर्ण संशयोंका सर्वथा निवारण करनेके लिये प्रसिद्ध हैं। मेरे हृदयमें एक संशय और है, उसका मेरे लिये समाधान कीजिये। राजन्! इस उत्पन्न हुए संशयके विषयमें मैं दूसरे किसीसे नहीं पूछूँगा ॥ १-२ ॥

यथा नरेण कर्तव्यं धर्ममार्गानुवर्तिना ।
एतत् सर्वं महाबाहो भवान् व्याख्यातुमर्हति ॥ ३ ॥
महाबाहो! धर्ममार्गका अनुसरण करनेवाले मनुष्यका इस विषयमें जैसा कर्तव्य हो, इस सबकी आप स्पष्टरूपसे व्याख्या करें ॥ ३ ॥

चतस्रो विहिता भार्या ब्राह्मणस्य पितामह ।
ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा च रतिमिच्छतः ॥ ४ ॥
पितामह! ब्राह्मणके लिये चार स्त्रियाँ शास्त्र-विहित हैं—ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा। इनमेंसे शूद्रा केवल रतिकी इच्छावाले कामी पुरुषके लिये विहित है ॥ ४ ॥

तत्र जातेषु पुत्रेषु सर्वासां कुरुसत्तम ।
आनुपूर्व्येण कस्तेषां पित्र्यं दायादमर्हति ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इन सबके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हों, उनमेंसे कौन क्रमशः पैतृक धनको पानेका अधिकारी है? ॥ ५ ॥

केन वा किं ततो हार्यं पितृवित्तात् पितामह ।
एतदिच्छामि कथितं विभागस्तेषु यः स्मृतः ॥ ६ ॥
पितामह! किस पुत्रको पिताके धनमेंसे कौन-सा भाग मिलना चाहिये? उनके लिये जो विभाग नियत किया गया है, उसका वर्णन मैं आपके मुहँसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
एतेषु विहितो धर्मो ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥ ७ ॥