महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
जलाशय बनानेका तथा बगीचे लगानेका फल
युधिष्ठिर उवाच
आरामाणां तडागानां यत् फलं कुरुपुंगव । तदहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतोऽद्य भरतर्षभ ॥ १ ॥ युधिष्ठिरने कहा— कुरुकुलपुंगव! भरतश्रेष्ठ! बगीचे लगाने और जलाशय बनवानेका जो फल होता है, उसीको अब मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सुप्रदर्शा बलवती चित्रा धातुविभूषिता । उपेता सर्वभूतैश्च श्रेष्ठा भूमिरिहोच्यते ॥ २ ॥ भीष्मजी बोले— राजन्! जो देखनेमें सुन्दर हो, जहाँकी मिट्टी प्रबल, अधिक अन्न उपजानेवाली हो, जो विचित्र एवं अनेक धातुओंसे विभूषित हो तथा समस्त प्राणी जहाँ निवास करते हों, वही भूमि यहाँ श्रेष्ठ बतायी जाती है ॥ २ ॥
तस्याः क्षेत्रविशेषांश्च तडागानां च बन्धनम् । औदकानि च सर्वाणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ३ ॥ उस भूमिसे सम्बन्ध रखनेवाले विशेष-विशेष क्षेत्र, उनमें पोखरोंके निर्माण तथा अन्य सब जलाशय—कूप आदि—इन सबके विषयमें मैं क्रमशः आवश्यक बातें बताऊँगा ॥ ३ ॥
तडागानां च वक्ष्यामि कृतानां चापि ये गुणाः । त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजनीयस्तडागवान् ॥ ४ ॥ पोखरे बनवानेसे जो लाभ होते हैं, उनका भी मैं वर्णन करूँगा। पोखरे बनवानेवाला मनुष्य तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजनीय होता है ॥ ४ ॥
अथवा मित्रसदनं मैत्रं मित्रविवर्धनम् । कीर्तिसंजननं श्रेष्ठं तडागानां निवेशनम् ॥ ५ ॥ अथवा पोखरोंका बनवाना मित्रके घरकी भाँति उपकारी, मित्रताका हेतु और मित्रोंकी वृद्धि करनेवाला तथा कीर्तिके विस्तारका सर्वोत्तम साधन है ॥ ५ ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः । तडागसुकृतं देशे क्षेत्रमेकं महाश्रयम् ॥ ६ ॥ मनीषी पुरुष कहते हैं कि देश या गाँवमें एक तालाबका निर्माण धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला है तथा पोखरेसे सुशोभित होनेवाला स्थान समस्त प्राणियोंके लिये