महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 581, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपापं कुर्वन्ति यत् किंचित् प्रजा राज्ञा ह्यरक्षिताः । चतुर्थं तस्य पापस्य राजा विन्दति भारत ॥ ३४ ॥ भरतनन्दन! राजासे अरक्षित होकर प्रजा जो कुछ भी पाप करती है, उस पापका एक चौथाई भाग राजाको भी प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥
अथाहुः सर्वमेवैति भूयोऽर्धमिति निश्चयः । चतुर्थं मतमस्माकं मनोः श्रुत्वानुशासनम् ॥ ३५ ॥ कुछ लोगोंका कहना है कि सारा पाप राजाको ही लगता है। दूसरे लोगोंका यह निश्चय है कि राजा आधे पापका भागी होता है। परंतु मनुका उपदेश सुनकर हमारा मत यही है कि राजाको उस पापका एक चतुर्थांश ही प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥
शुभं वा यच्च कुर्वन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः । चतुर्थं तस्य पुण्यस्य राजा चाप्नोति भारत ॥ ३६ ॥ भारत! राजासे भलीभाँति सुरक्षित होकर प्रजा जो भी शुभ कर्म करती है, उसके पुण्यका चौथाई भाग राजा प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥
जीवन्तं त्वानुजीवन्तु प्रजाः सर्वा युधिष्ठिर । पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिवाण्डजाः ॥ ३७ ॥ कुबेरमिव रक्षांसि शतक्रतुमिवामराः । ज्ञातयस्त्वानुजीवन्तु सुहृदश्च परंतप ॥ ३८ ॥ परंतप युधिष्ठिर! जैसे सब प्राणी मेघके सहारे जीवन धारण करते हैं, जैसे पक्षी महान् वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, तथा जिस प्रकार राक्षस कुबेरके और देवता इन्द्रके आश्रित रहकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे जीते-जी सारी प्रजा तुमसे ही अपनी जीविका चलाये तथा तुम्हारे सुहृद् एवं भाई-बन्धु भी तुमपर ही अवलम्बित होकर जीवन निर्वाह करें ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/३ श्लोक हैं)