भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 653, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 653

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द्विसप्ततितमोऽध्यायः

गौओंके लोक और गोदानविषयक युधिष्ठिर और इन्द्रके प्रश्न

युधिष्ठिर उवाच

उक्तं ते गोप्रदानं वै नाचिकेतमृषिं प्रति ।
माहात्म्यमपि चैवोक्तमुद्देशेन गवां प्रभो ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— प्रभो! आपने नाचिकेत ऋषिके प्रति किये गये गोदानसम्बन्धी उपदेशकी चर्चा की और गौओंके माहात्म्यका भी संक्षेपसे वर्णन किया ॥ १ ॥

नृगेण च महद्दुःखमनुभूतं महात्मना ।
एकापराधादज्ञानात् पितामह महामते ॥ २ ॥
महामते पितामह! महात्मा राजा नृगने अनजानमें किये हुए एकमात्र अपराधके कारण महान् दुःख भोगा था ॥ २ ॥

द्वारवत्यां यथा चासौ निविशन्त्यां समुद्धृतः ।
मोक्षहेतुरभूत् कृष्णस्तदप्यवधृतं मया ॥ ३ ॥
जब द्वारकापुरी बसने लगी थी, उस समय उनका उद्धार हुआ और उनके उस उद्धारमें हेतु हुए भगवान् श्रीकृष्ण। ये सारी बातें मैंने ध्यानसे सुनी और समझी हैं ॥ ३ ॥

किं त्वस्ति मम संदेहो गवां लोकं प्रति प्रभो ।
तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि गोदा यत्र वसन्त्युत ॥ ४ ॥
परन्तु प्रभो! मुझे गोलोकके सम्बन्धमें कुछ संदेह है; अतः गोदान करनेवाले मनुष्य जिस लोकमें निवास करते हैं, उसका मैं यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथापृच्छत् पद्मयोनिमेतदेव शतक्रतुः ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। जैसा कि इन्द्रने किसी समय ब्रह्माजीसे यही प्रश्न किया था ॥ ५ ॥

शक्र उवाच

स्वर्लोकवासिनां लक्ष्मीमभिभूय स्वयार्चिषा ।
गोलोकवासिनः पश्ये व्रजतः संशयोऽत्र मे ॥ ६ ॥

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