भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 654

⬅ विषय-सूची (TOC)

इन्द्रने पूछा— भगवन्! मैं देखता हूँ कि गोलोक-निवासी पुरुष अपने तेजसे स्वर्गवासियोंकी कान्ति फीकी करते हुए उन्हें लाँघकर चले जाते हैं; अतः मेरे मनमें यहाँ यह संदेह होता है ।। ६ ।।


इन्द्रका ब्रह्माजीके साथ गौओंके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर

कीदृशा भगवाँल्लोका गवां तद् ब्रूहि मेऽनघ ।
यानावसन्ति दातार एतदिच्छामि वेदितुम् ।। ७ ।।
भगवन्! गौओंके लोक कैसे हैं? अनघ! यह मुझे बताइये। गोदान करनेवाले लोग जिन लोकोंमें निवास करते हैं, उनके विषयमें निम्नांकित बातें जानना चाहता हूँ ।। ७ ।।

कीदृशाः किंफलाः किंस्वित् परमस्तत्र को गुणः ।
कथं च पुरुषास्तत्र गच्छन्ति विगतज्वराः ।। ८ ।।
वे लोक कैसे हैं? वहाँ क्या फल मिलता है? वहाँका सबसे महान् गुण क्या है? गोदान करनेवाले मनुष्य सब चिन्ताओंसे मुक्त होकर वहाँ किस प्रकार पहुँचते हैं? ।। ८ ।।

कियत्कालं प्रदानस्य दाता च फलमश्नुते ।
कथं बहुविधं दानं स्यादल्पमपि वा कथम् ।। ९ ।।