महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 662, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरस्पर तारतम्य है, उसको तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको जानना बहुत ही
कठिन है ॥ ३८ ॥
स्वाध्यायाढ्यं शुद्धयोनिं प्रशान्तं
वैतानस्थं पापभीरुं बहुज्ञम् ।
गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं
वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहुः ॥ ३९ ॥
जो वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, शुद्ध कुलमें उत्पन्न, शान्तस्वभाव, यज्ञपरायण, पापभीरु
और बहुज्ञ है, जो गौओंके प्रति क्षमाभाव रखता है, जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा नहीं है,
जो गौओंकी रक्षा करनेमें समर्थ और जीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम
पात्र बताया गया है ॥ ३९ ॥
वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं
कृष्यर्थे वा होम्यहेतोः प्रसूतेः ।
गुर्वर्थं वा बालसंवृद्धये वा
धेनुं दद्याद् देशकालेऽविशिष्टे ॥ ४० ॥
जिसकी जीविका क्षीण हो गयी हो तथा जो अत्यन्त कष्ट पा रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको
सामान्य देश-कालमें भी दूध देनेवाली गायका दान करना चाहिये। इसके सिवा खेतीके
लिये, होम-सामग्रीके लिये, प्रसूता स्त्रीके पोषणके लिये, गुरुदक्षिणाके लिये अथवा शिशु-
पालनके लिये सामान्य देश-कालमें भी दुधारू गायका दान करना उचित है ॥ ४० ॥
अन्तर्ज्ञाताः सक्रयज्ञानलब्धाः
प्राणैः क्रीतास्तेजसा यौतकाश्च ।
कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणाभ्यागताश्च
द्वारैरेतैर्गोविशेषाः प्रशस्ताः ॥ ४१ ॥
गर्भिणी, खरीदकर लायी हुई, ज्ञान या विद्याके बलसे प्राप्त की हुई, दूसरे प्राणियोंके
बदलेमें लायी हुई अथवा युद्धमें पराक्रम प्रकट करके प्राप्त की हुई, दहेजमें मिली हुई,
पालनमें कष्ट समझकर स्वामीके द्वारा परित्यक्त हुई तथा पालन-पोषणके लिये अपने पास
आयी हुई विशिष्ट गौएँ इन उपर्युक्त कारणोंसे ही दानके लिये प्रशंसनीय मानी गयी
हैं ॥ ४१ ॥
बलान्विताः शीलवयोपपन्नाः
सर्वाः प्रशंसन्ते सुगन्धवत्यः ।
यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा
तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ॥ ४२ ॥
हृष्ट-पुष्ट, सीधी-सादी, जवान और उत्तम गन्धवाली सभी गौएँ प्रशंसनीय मानी गयी हैं।
जैसे गंगा सब नदियोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कपिला गौ सब गौओंमें उत्तम है ॥