भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 673, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 673

राजन्! यदि ब्राह्मण विशेषरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करे तो वह सम्पूर्ण पापोंको भस्म कर डालता है; क्योंकि ब्रह्मचारी ब्राह्मण अग्निस্বরূপ कहा जाता है ।। ३७ ।।
प्रत्यक्षं हि तथा ह्येतद् ब्राह्मणेषु तपस्विषु ।
बिभेति हि यथा शक्रो ब्रह्मचारिप्रधर्षितः ॥ ३८ ॥
तद् ब्रह्मचर्यस्य फलमृषीणामिह दृश्यते ।
मातापित्रोः पूजने यो धर्मस्तमपि मे शृणु ॥ ३९ ॥
तपस्वी ब्राह्मणोंमें यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है; क्योंकि ब्रह्मचारीके आक्रमण करनेपर साक्षात् इन्द्र भी डरते हैं। ब्रह्मचर्यका वह फल यहाँ ऋषियोंमें दृष्टिगोचर होता है। अब तुम माता-पिता आदिके पूजनसे जो धर्म होता है, उसके विषयमें भी मुझसे सुनो ॥ ३८-३९ ॥
शुश्रूषते यः पितरं न चासूयेत् कदाचन ।
मातरं भ्रातरं वापि गुरुमाचार्यमेव च ॥ ४० ॥
तस्य राजन् फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमर्चितम् ।
न च पश्येत नरकं गुरुशुश्रूषयाऽऽत्मवान् ॥ ४१ ॥
राजन्! जो पिता-माता, बड़े भाई, गुरु और आचार्यकी सेवा करता है और कभी उनके गुणोंमें दोषदृष्टि नहीं करता है, उसको मिलनेवाले फलको जान लो। उसे स्वर्गलोकमें सर्वसम्मानित स्थान प्राप्त होता है। मनको वशमें रखनेवाला वह पुरुष गुरुशुश्रूषाके प्रभावसे कभी नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ४०-४१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

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