महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टसप्ततितमोऽध्यायः
वसिष्ठका सौदासको गोदानकी विधि एवं महिमा बताना
भीष्म उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।
इक्ष्वाकुवंशजो राजा सौदासो वदतां वरः ॥ १ ॥
सर्वलोकचरं सिद्धं ब्रह्मकोशं सनातनम् ।
पुरोहितमभिप्रष्टुमभिवाद्योपचक्रमे ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! एक समयकी बात है, वक्ताओंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदासने सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, वैदिक ज्ञानके भण्डार, सिद्ध सनातन ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे, जो उन्हींके पुरोहित थे, प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ॥ १-२ ॥
सौदास उवाच
त्रैलोक्ये भगवन् किंस्वित् पवित्रं कथ्यतेऽनघ ।
यत् कीर्तयन् सदा मर्त्यः प्राप्नुयात् पुण्यमुत्तमम् ॥ ३ ॥
सौदास बोले—भगवन्! निष्पाप महर्षे! तीनों लोकोंमें ऐसी पवित्र वस्तु कौन कही जाती है जिसका नाम लेनेमात्रसे मनुष्यको सदा उत्तम पुण्यकी प्राप्ति हो सके? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
तस्मै प्रोवाच वचनं प्रणताय हितं तदा ।
गवामुपनिषद्द्विद्वान् नमस्कृत्य गवां शुचिः ॥ ४ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! अपने चरणोंमें पड़े हुए राजा सौदाससे गवोपनिषद् (गौओंकी महिमाके गूढ़ रहस्यको प्रकट करनेवाली विद्या) के विद्वान् पवित्र महर्षि वसिष्ठने गौओंको नमस्कार करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ४ ॥
गावः सुरभिगन्धिन्यस्तथा गुग्गुलुगन्धयः ।
गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत् ॥ ५ ॥
'राजन्! गौओंके शरीरसे अनेक प्रकारकी मनोरम सुगन्ध निकलती रहती है तथा बहुतेरी गौएँ गुग्गुलके समान गन्धवाली होती हैं। गौएँ समस्त प्राणियोंकी प्रतिष्ठा (आधार) हैं और गौएँ ही उनके लिये महान् मंगलकी निधि हैं ॥ ५ ॥
गावो भूतं च भव्यं च गावः पुष्टिः सनातनी ।
गावो लक्ष्म्यास्तथा मूलं गोषु दत्तं न नश्यति ॥ ६ ॥