महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 713, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्र्यशीतितमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना
भीष्म उवाच
ये च गां सम्प्रयच्छन्ति हुतशिष्टाशिनश्च ये ।
तेषां सत्राणि यज्ञाश्च नित्यमेव युधिष्ठिर ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! जो मनुष्य सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन और गोदान करते हैं उन्हें प्रतिदिन अन्नदान और यज्ञ करनेका फल मिलता है ॥ १ ॥
ऋते दधि घृतेनेह न यज्ञः सम्प्रवर्तते ।
तेन यज्ञस्य यज्ञत्वमतो मूलं च कथ्यते ॥ २ ॥
दही और गोघृतके बिना यज्ञ नहीं होता। उन्हींसे यज्ञका यज्ञत्व सफल होता है। अतः गौओंको यज्ञका मूल कहते हैं ॥ २ ॥
दानानामपि सर्वेषां गवां दानं प्रशस्यते ।
गावः श्रेष्ठाः पवित्राश्च पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
सब प्रकारके दानोंमें गोदान ही उत्तम माना जाता है; इसलिये गौएँ श्रेष्ठ, पवित्र तथा परम पावन हैं ॥ ३ ॥
पुष्ट्यर्थमेताः सेवेत शान्त्यर्थमपि चैव ह ।
पयोदधिघृतं चासां सर्वपापप्रमोचनम् ॥ ४ ॥
मनुष्यको अपने शरीरकी पुष्टि तथा सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये भी गौओंका सेवन करना चाहिये। इनके दूध, दही और घी सब पापोंसे छुड़ानेवाले हैं ॥ ४ ॥
गावस्तेजः परं प्रोक्तमिह लोके परत्र च ।
न गोभ्यः परमं किंचित् पवित्रं भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! गौएँ इहलोक और परलोकमें भी महान् तेजोरूप मानी गयी हैं। गौओंसे बढ़कर पवित्र कोई वस्तु नहीं है ॥ ५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पितामहस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इन्द्र और ब्रह्माजीके इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६ ॥
पराभूतेषु दैत्येषु शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः ।
प्रजाः समुदिताः सर्वाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ७ ॥