भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 833, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 833

सूर्य उवाच असंशयं मां विप्रर्षे भेत्स्यसे धन्विनां वर । अपकारिणं मां विद्धि भगवन् शरणागतम् ॥ ७ ॥ **सूर्य बोले—**धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! निस्संदेह आप मेरे शरीरका भेदन कर सकते हैं। भगवन्! यद्यपि मैं आपका अपराधी हूँ तो भी आप मुझे अपना शरणागत समझिये ॥ ७ ॥

भीष्म उवाच ततः प्रहस्य भगवान् जमदग्निरुवाच तम् । न भीः सूर्य त्वया कार्या प्रणिपातगतो ह्यसि ॥ ८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! सूर्यदेवकी यह बात सुनकर भगवान् जमदग्नि हँस पड़े और उनसे बोले—'सूर्यदेव! अब तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये; क्योंकि तुम मेरे शरणागत हो गये हो ॥ ८ ॥

ब्राह्मणेष्वार्जवं यच्च स्थैर्यं च धरणीतले । सौम्यतां चैव सोमस्य गाम्भीर्यं वरुणस्य च ॥ ९ ॥ दीप्तिमग्नेः प्रभां मेरोः प्रतापं तपनस्य च । एतान्यतिक्रमेद् यो वै स हन्याच्छरणागतम् ॥ १० ॥ 'ब्राह्मणोंमें जो सरलता है, पृथ्वीमें जो स्थिरता है, सोमका जो सौम्यभाव, सागरकी जो गम्भीरता, अग्निकी जो दीप्ति, मेरुकी जो चमक और सूर्यका जो प्रताप है—इन सबका वह पुरुष उल्लंघन कर जाता है, इन सबकी मर्यादाका नाश करनेवाला समझा जाता है जो शरणागतका वध करता है ॥ ९-१० ॥

भवेत् स गुरुतल्पी च ब्रह्महा च स वै भवेत् । सुरापानं स कुर्याच्च यो हन्याच्छरणागतम् ॥ ११ ॥ जो शरणागतकी हत्या करता है, उसे गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या और मदिरापानका पाप लगता है' ॥ ११ ॥

एतस्य त्वपनीतस्य समाधिं तात चिन्तय । यथा सुखगमः पन्था भवेत् त्वद्रश्मिभावितः ॥ १२ ॥ तात! इस समय तुम्हारे द्वारा जो यह अपराध हुआ है, उसका कोई समाधान—उपाय सोचो। जिससे तुम्हारी किरणोंद्वारा तपा हुआ मार्ग सुगमतापूर्वक चलने योग्य हो सके' ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच एतावदुक्त्वा स तदा तूष्णीमासीद् भृगूत्तमः । अथ सूर्योऽददत् तस्मै छत्रोपानहमाशु वै ॥ १३ ॥