महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः
कर्मोंके फलका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
कर्मणां च समस्तानां शुभानां भरतर्षभ ।
फलानि महतां श्रेष्ठ प्रब्रूहि परिपृच्छतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महापुरुषोंमें प्रधान भरतश्रेष्ठ! अब मैं समस्त शुभ कर्मोंके फल क्या हैं? यह पूछ रहा हूँ, अतः यही बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां पृच्छसि भारत ।
रहस्यं यदृषीणां तु तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ।
या गतिः प्राप्यते येन प्रेत्यभावे चिरेप्सिता ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, यह ऋषियोंके लिये भी रहस्यका विषय है; किंतु मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। सुनो, मरनेके बाद जिस मनुष्यको जैसी चिर अभिलषित गति मिलती है, उसका भी वर्णन करता हूँ ॥ २ ॥
येन येन शरीरेण यद् यत् कर्म करोति यः ।
तेन तेन शरीरेण तत् तत् फलमुपाश्नुते ॥ ३ ॥
मनुष्य जिस-जिस (स्थूल या सूक्ष्म) शरीरसे जो-जो कर्म करता है उसी-उसी शरीरसे उस-उस कर्मका फल भोगता है ॥ ३ ॥
यस्यां यस्यामवस्थायां यत् करोति शुभाशुभम् ।
तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि ॥ ४ ॥
जिस-जिस अवस्थामें वह जो-जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, प्रत्येक जन्मकी उसी-उसी अवस्थामें वह उसका फल भोगता है ॥ ४ ॥
न नश्यति कृतं कर्म सदा पञ्चेन्द्रियैरिह ।
ते ह्यस्य साक्षिणो नित्यं षष्ठ आत्मा तथैव च ॥ ५ ॥
पाँचों इन्द्रियोंद्वारा किया हुआ कर्म कभी नष्ट नहीं होता है। वे पाँचों इन्द्रियाँ और छठा मन—ये उस कर्मके साक्षी होते हैं ॥ ५ ॥
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।
अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥ ६ ॥
अतः मनुष्यको उचित है कि यदि कोई अतिथि घरपर आ जाय तो उसको प्रसन्न दृष्टिसे देखे। उसकी सेवामें मन लगावे। मीठी बोली बोलकर उसे संतुष्ट करे। जब वह जाने लगे तो