भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 943, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 943

जो आश्विन मासको एक समय भोजन करके बिताता है, वह पवित्र, नाना प्रकारके वाहनोंसे सम्पन्न तथा अनेक पुत्रोंसे युक्त होता है ॥ २९ ॥ कार्तिकं तु नरो मासं यः कुर्यादेकभोजनम् । शूरश्च बहुभार्यश्च कीर्तिमांश्चैव जायते ॥ ३० ॥ जो मनुष्य कार्तिक मासमें एक समय भोजन करता है, वह शूरवीर, अनेक भार्याओंसे संयुक्त और कीर्तिमान् होता है ॥ ३० ॥ इति मासा नरव्याघ्र क्षिपतां परिकीर्तिताः । तिथीनां नियमा ये तु शृणु तानपि पार्थिव ॥ ३१ ॥ पुरुषसिंह! इस प्रकार मैंने मासपर्यन्त एकभुक्त व्रत करनेवाले मनुष्योंके लिये विभिन्न मासोंके फल बताये हैं। पृथिवीनाथ! अब तिथियोंके जो नियम हैं, उन्हें भी सुन लो ॥ ३१ ॥ पक्षे पक्षे गते यस्तु भक्तमश्नाति भारत । गवाढ्यो बहुपुत्रश्च बहुभार्यः स जायते ॥ ३२ ॥ भरतनन्दन! जो पंद्रह-पंद्रह दिनपर भोजन करता है, वह गोधनसे सम्पन्न और बहुत-से पुत्र तथा स्त्रियोंसे युक्त होता है ॥ ३२ ॥ मासि मासि त्रिरात्राणि कृत्वा वर्षाणि द्वादश । गणाधिपत्यं प्राप्नोति निःसपत्नमनाविलम् ॥ ३३ ॥ जो बारह वर्षोंतक प्रतिमास अनेक त्रिरात्रव्रत करता है, वह भगवान् शिवके गणोंका निष्कण्टक एवं निर्मल आधिपत्य प्राप्त करता है ॥ ३३ ॥ एते तु नियमाः सर्वे कर्तव्याः शरदो दश । द्वे चान्ये भरतश्रेष्ठ प्रवृत्तिमनुवर्तता ॥ ३४ ॥ भरतश्रेष्ठ! प्रवृत्तिमार्गका अनुसरण करनेवाले पुरुषको ये सभी नियम बारह वर्षोंतक पालन करने चाहिये ॥ ३४ ॥ यस्तु प्रातस्तथा सायं भुञ्जानो नान्तरा पिबेत् । अहिंसानिरतो नित्यं जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ३५ ॥ षड्भिः स वर्षेर्नृपते सिध्यते नात्र संशयः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ३६ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन सबेरे और शामको भोजन करता है, बीचमें जलतक नहीं पीता तथा सदा अहिंसा-परायण होकर नित्य अग्निहोत्र करता है, उसे छः वर्षोंमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसमें संशय नहीं है तथा नरेश्वर! वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ॥ अधिवासे सोऽप्सरसां नृत्यगीतविनादिते । रमते स्त्रीसहस्राढ्ये सुकृती विरजो नरः ॥ ३७ ॥ वह पुण्यात्मा एवं रजोगुणरहित पुरुष सहस्रों दिव्य रमणियोंसे भरे हुए अप्सराओंके महलमें, जहाँ नृत्य और गीतकी ध्वनि गूँजती रहती है, रमण करता है ॥ ३७ ॥