महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरेश्वर! जो मनुष्य चार दिनोंपर भोजन करता हुआ एक वर्षतक जीवन धारण करता है, उसे गवामय यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ४५ १/२ ॥
हंससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति ॥ ४६ ॥
पञ्चाशतं सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ।
वह हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानद्वारा जाता है और पचास हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ॥ ४६ १/२ ॥
पक्षे पक्षे गते राजन् योऽश्रीयाद् वर्षमेव तु ॥ ४७ ॥
षण्मासानशनं तस्य भगवानङ्गिराऽब्रवीत् ।
राजन्! जो एक-एक पक्ष बीतनेपर भोजन करता है और इसी तरह एक वर्ष पूरा कर देता है, उसको छः मासतक अनशन करनेका फल मिलता है। ऐसा भगवान् अंगिरा मुनिका कथन है ॥ ४७ १/२ ॥
षष्टिर्वर्षसहस्राणि दिवमावसते च सः ॥ ४८ ॥
वीणानां वल्लकीनां च वेणूनां च विशाम्पते ।
सुघोषैर्मधुरैः शब्दैः सुप्तः स प्रतिबोध्यते ॥ ४९ ॥
प्रजानाथ! वह साठ हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है और वहाँ वीणा, वल्लकी, वेणु आदि वाद्योंके मनोरम घोष तथा सुमधुर शब्दोंद्वारा उसे सोतेसे जगाया जाता है ॥ ४८-४९ ॥
संवत्सरमिहैकं तु मासि मासि पिबेदपः ।
फलं विश्वजितस्तात प्राप्नोति स नरो नृप ॥ ५० ॥
तात! नरेश्वर! जो मनुष्य एक वर्षतक प्रतिमास एक बार जल पीकर रहता है, उसे विश्वजित् यज्ञका फल मिलता है ॥ ५० ॥
सिंहव्याघ्रप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति ।
सप्ततिं च सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ॥ ५१ ॥
वह सिंह और व्याघ्र जुते हुए विमानसे यात्रा करता है और सत्तर हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ॥
मासादूर्ध्वं नरव्याघ्र नोपवासो विधीयते ।
विधिं त्वनशनस्याहुः पार्थ धर्मविदो जनाः ॥ ५२ ॥
पुरुषसिंह! एक माससे अधिक समयतक उपवास करनेका विधान नहीं है। कुन्तीनन्दन! धर्मज्ञ पुरुषोंने अनशनकी यही विधि बतायी है ॥ ५२ ॥
अनार्तो व्याधिरहितो गच्छेदन्शनं तु यः ।
पदे पदे यज्ञफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥ ५३ ॥
जो बिना रोग-व्याधिके अनशन व्रत करता है, उसे पद-पदपर यज्ञका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥