महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 946, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिवं हंसप्रयुक्तेन विमानेन स गच्छति । शतं वर्षसहस्राणां मोदते स दिवि प्रभो ॥ ५४ ॥ शतं चाप्सरसः कन्या रमयन्त्यपि तं नरम् । प्रभो! ऐसा पुरुष हंस जुते हुए दिव्य विमानसे यात्रा करता है और एक लाख वर्षोंतक देवलोकमें आनन्द भोगता है, सैकड़ों कुमारी अप्सराएँ उस मनुष्यका मनोरंजन करती हैं ॥ ५४ १/२ ॥
आर्तो वा व्याधितो वापि गच्छेदन्शनं तु यः ॥ ५५ ॥ शतं वर्षसहस्राणां मोदते स दिवि प्रभो । प्रभो! रोगी अथवा पीड़ित मनुष्य भी यदि उपवास करता है तो वह एक लाख वर्षोंतक स्वर्गमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ५५ १/२ ॥
काञ्चीनूपुरशब्देन सुप्तश्चैव प्रबोध्यते ॥ ५६ ॥ सहस्रहंसयुक्तेन विमानेन तु गच्छति । वह सो जानेपर दिव्य रमणियोंकी कांची और नूपुरोंकी झनकारसे जागता है और ऐसे विमानसे यात्रा करता है, जिसमें एक हजार हंस जुते रहते हैं ॥ ५६ १/२ ॥
स गत्वा स्त्रीशताकीर्णे रमते भरतर्षभ ॥ ५७ ॥ क्षीणस्याप्यायनं दृष्टं क्षतस्य क्षतरोहणम् । व्याधितस्यौषधग्रामः क्रुद्धस्य च प्रसादनम् ॥ ५८ ॥ दुःखितस्यार्थमानाभ्यां दुःखानां प्रतिषेधनम् । न चैते स्वर्गकामस्य रोचन्ते सुखमेधसः ॥ ५९ ॥ भरतश्रेष्ठ! वह स्वर्गमें जाकर सैकड़ों रमणियोंसे भरे हुए महलमें रमण करता है। इस जगत्में दुर्बल मनुष्यको हृष्ट-पुष्ट होते देखा गया है। जिसे घाव हो गया है, उसका घाव भी भर जाता है। रोगीको अपने रोगकी निवृत्तिके लिये औषधसमूह प्राप्त होता है। क्रोधमें भरे हुए पुरुषको प्रसन्न करनेका उपाय भी उपलब्ध होता है। अर्थ और मानके लिये दुःखी हुए पुरुषके दुःखोंका निवारण भी देखा गया है; परन्तु स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले और दिव्य सुख चाहनेवाले पुरुषको ये सब इस लोकके सुखोंकी बातें अच्छी नहीं लगतीं ॥ ५७—५९ ॥
अतः स कामसंयुक्ते विमाने हेमसंनिभे । रमते स्त्रीशताकीर्णे पुरुषोऽलंकृत शुचिः ॥ ६० ॥ स्वस्थः सफलसंकल्पः सुखी विगतकल्मषः । अतः वह पवित्रात्मा पुरुष वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सैकड़ों स्त्रियोंसे भरे हुए और इच्छानुसार चलनेवाले सुवर्ण-सदृश विमानपर बैठकर रमण करता है। वह स्वस्थ, सफलमनोरथ, सुखी एवं निष्पाप होता है ॥
अनश्नन् देहमुत्सृज्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ६१ ॥ बालसूर्यप्रतीकाशे विमाने हेमवर्चसि ।