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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 947, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 947

वैदूर्यमुक्ताखचिते वीणामुरजनादिते ॥ ६२ ॥ पताकादीपिकाकीर्णे दिव्यघण्टानिनादिते । स्त्रीसहस्रानुचरिते स नरः सुखमेधते ॥ ६३ ॥ जो मनुष्य अनशन-व्रत करके अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह निम्नांकित फलका भागी होता है। वह प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशमान, सुनहरी कान्तिवाले, वैदूर्य और मोतीसे जटित, वीणा और मृदंगकी ध्वनिसे निनादित, पताका और दीपकोंसे आलोकित तथा दिव्य घण्टानादसे गूँजते हुए, सहस्रों अप्सराओंसे युक्त विमानपर बैठकर दिव्य सुख भोगता है ॥ ६१—६३ ॥

यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु पाण्डव । तावन्त्येव सहस्राणि वर्षाणां दिवि मोदते ॥ ६४ ॥ पाण्डुनन्दन! उसके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही सहस्र वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ६४ ॥

नास्ति वेदात् परं शास्त्रं नास्ति मातृसमो गुरुः । न धर्मात् परमो लाभस्तपो नानशनात् परम् ॥ ६५ ॥ वेदसे बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, धर्मसे बढ़कर कोई उत्कृष्ट लाभ नहीं है तथा उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ॥ ६५ ॥

ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति पावनं दिवि चेह च । उपवासैस्तथा तुल्यं तपःकर्म न विद्यते ॥ ६६ ॥ जैसे इस लोक और परलोकमें ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणोंसे बढ़कर कोई पावन नहीं है, उसी प्रकार उपवासके समान कोई तप नहीं है ॥ ६६ ॥

उपोष्य विधिवद् देवास्त्रिदिवं प्रतिपेदिरे । ऋषयश्च परां सिद्धिमुपवासैरुपाप्नुवन् ॥ ६७ ॥ देवताओंने विधिवत् उपवास करके ही स्वर्ग प्राप्त किया है तथा ऋषियोंको भी उपवाससे ही सिद्धि प्राप्त हुई है ॥ ६७ ॥

दिव्यवर्षसहस्राणि विश्वामित्रेण धीमता । क्षान्तमेकेन भक्तेन तेन विप्रत्वमागतः ॥ ६८ ॥ परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजी एक हजार दिव्य वर्षोंतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके भूखका कष्ट सहते हुए तपमें लगे रहे। उससे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई ॥

च्यवनो जमदग्निश्च वसिष्ठो गौतमो भृगुः । सर्व एव दिवं प्राप्ताः क्षमावन्तो महर्षयः ॥ ६९ ॥ च्यवन, जमदग्नि, वसिष्ठ, गौतम, भृगु—ये सभी क्षमावान् महर्षि उपवास करके ही दिव्य लोकोंको प्राप्त हुए हैं ॥ ६९ ॥

इदमङ्गिरसा पूर्वं महर्षिभ्यः प्रदर्शितम् ।

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