महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 949, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्ताधिकशततमोऽध्यायः
दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
पितामहेन विधिवद् यज्ञाः प्रोक्ता महात्मना ।
गुणाश्चैषां यथातथ्यं प्रेत्य चेह च सर्वशः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— महात्मा पितामहने विधिपूर्वक यज्ञोंका वर्णन किया और इहलोक तथा परलोकमें जो उनके सम्पूर्ण गुण हैं, उनका भी यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया ॥ १ ॥
न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं पितामह ।
बहूपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः ॥ २ ॥
किन्तु पितामह! दरिद्र मनुष्य उन यज्ञोंका लाभ नहीं उठा सकता; क्योंकि उन यज्ञोंके उपकरण बहुत हैं और अनेक प्रकारके आयोजनोंके कारण उनका विस्तार बहुत बढ़ जाता है ॥ २ ॥
पार्थिवै राजपुत्रैर्वा शक्याः प्राप्तुं पितामह ।
नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतैः ॥ ३ ॥
दादाजी! राजा अथवा राजपुत्र ही उन यज्ञोंका लाभ ले सकते हैं। जिनके पास धनकी कमी है, जो गुणहीन, एकाकी और असहाय हैं, वे उस प्रकारके यज्ञ नहीं कर सकते ॥ ३ ॥
यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं सदा भवेत् ।
अर्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतैः ॥ ४ ॥
तुल्यो यज्ञफलैरेतैस्तन्मे ब्रूहि पितामह ।
इसलिये जिस कर्मका अनुष्ठान दरिद्रों, गुणहीनों, एकाकी और असहायोंके लिये भी सुगम तथा बड़े-बड़े यज्ञोंके समान फल देनेवाला हो, उसीका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ४ १/२ ॥
भीष्म उवाच
इदमङ्गिरसा प्रोक्तमुपवासफलात्मकम् ॥ ५ ॥
विधिं यज्ञफलैस्तुल्यं तन्निबोध युधिष्ठिर ।
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! अंगिरा मुनिकी बतलायी हुई जो उपवासकी विधि है, वह यज्ञोंके समान ही फल देनेवाली है। उसका पुनः वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ५ १/२ ॥