महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 971, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाधिकशततमोऽध्यायः
प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् ।
यच्चाप्यसंशयं लोके तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! समस्त उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ और महान् फल देनेवाला है तथा जिसके विषयमें लोगोंको कोई संशय नहीं है, वह आप मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन् यथा गीतं स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
यत् कृत्वा निर्वृतो भूयात् पुरुषो नाज संशयः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! स्वयम्भू भगवान् विष्णुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसे बताता हूँ, सुनो। उसका अनुष्ठान करके पुरुष परम सुखी हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
द्वादश्यां मार्गशीर्षे तु अहोरात्रेण केशवम् ।
अर्च्यश्वमेधं प्राप्नोति दुष्कृतं चास्य नश्यति ॥ ३ ॥
मार्गशीर्षमासमें द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् केशवकी पूजा-अर्चा करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पा लेता है और उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है ॥ ३ ॥
तथैव पौषमासे तु पूज्यो नारायणेति च ।
वाजपेयमवाप्नोति सिद्धिं च परमां व्रजेत् ॥ ४ ॥
इसी प्रकार पौषमासमें द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान् नारायणकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाले पुरुषको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है और वह परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४ ॥
अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम् ।
राजसूयमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५ ॥
माघमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् माधवकी पूजा करनेसे उपासकको राजसूय यज्ञका फल प्राप्त होता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५ ॥