भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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भूमिका । १७ वेद अर्थ में त्यों अज्ञाना । नशिहै श्रीशंकर व्याख्याना ॥ करिहैं ते उपदेश यथारथ । नाशिहि संशय अरु अयथारथ ॥ और जु वेद अर्थ को करिहैं । ते सब वृथा परिश्रम धरिहैं ॥ यौं पुरान में व्यास कही है । शंकर मत में मान यही है ॥ मध्वादिक को मत न प्रमानी । यह हम ब्यासवचन तें जानी ॥ और प्रमान कहौं सो सुनिये । वालमीकि ऋषि मुख्य जु गिनिये॥ तिन मुनि कियो ग्रन्थ वाशिष्ठा । तामें मत अद्वैत स्पष्टा ॥ श्रीशंकर अद्वैतहि गान्यो । तिनको मत यह हेतु प्रमान्यो ॥ वाल्मीकि ऋषिवचन विरुद्धं । भेद वाद लखि सकल अशुद्धम् ॥ ’ इत्यादि । १ । आदिकवि-वाल्मीकि ऋषि ने उत्तर रामायण वासिष्ठ नाम ग्रन्थ बनाया है, वहां अद्वैत मत में प्रधान जो दृष्टि सृष्टिवाद है उसको अनेक इतिहासों से प्रतिपादन किया है, इसलिये वाल्मीकिवचन के अनुसार भी अद्वैतमत प्रमाण है और वाल्मीकिवचनविरुद्ध भेदवाद अप्रमाण है । २ । और खण्डनखण्डखाद्य तथा भेदधिक्कार आदि ग्रन्थों में अनेक युक्ति से भेदवाद का खण्डन है । किं बहुना, वेदान्तसार विष्णु शिव शक्ति आदि किसी ब्रह्मविभूति के उपासक क्यों न हों उन सब को अद्वैतमत इष्ट है । अतएव वैष्णवशिरोमणि तुलसीदास ने यह कहा है— ‘ यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषेव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः । ’ इत्यादि ।