मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ मनुस्मृति । अन्न लाकर न खावे । क्योंकि भिक्षा से जो निर्वाह होता है, वह ऋत के समान माना जाता है । देवयज्ञ में निमन्त्रण हो तो निषिद्ध पदार्थ छोड़कर एक का भी अन्न तृप्तिपूर्वक भोजन करे और श्राद्ध में ऋषियों के समान भोजन करे इस प्रकार व्रत भंग नहीं होता है । लेकिन विद्वानों ने यह कर्म ब्राह्मण ब्रह्मचारी के लिए कहा है, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ऐसा कर्म नहीं है ॥ १८८-१६० ॥ चोदितो गुरुणा नित्यमप्रचोदित एव वा । कुर्यादध्ययने यत्नमाचार्यस्य हितेषु च ॥ १६१ ॥ शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च । नियम्य प्राञ्जलिस्तिष्ठेदीक्ष्यमाणो गुरोर्मुखम् ॥ १६२ ॥ नित्यमुद्धृतपाणिः स्यात्साध्वाचारः सुसंयुतः । आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः ॥ १६३ ॥ हीनान्नवस्त्रवेशः स्यात्सर्वदा गुरुसन्निधौ । उत्तिष्ठेत्प्रथमं चास्य चरमं चैव संविशेत् ॥ १६४ ॥ प्रतिश्रवणसंभाषे शयानो न समाचरेत् । नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः ॥ १६५ ॥ गुरु रोज़ कहे वा न कहे, पर अध्ययन और आचार्य के हित के लिए सदा यत्न करना चाहिए । शरीर, वाणी, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय और मन का संयम करके हाथ जोड़कर गुरुमुख को देखता हुआ रहा करे । ओढ़ने के वस्त्र से दाहना हाथ सदा बाहर रक्खे, और गुरुआज्ञा से सामने बैठे । गुरु के पास में सादा भोजन और सादा वस्त्र सदा पहने और गुरु के पहले जागे और पीछे सोवे । ब्रह्मचारी सोता, बैठा, खाता, खड़ा और मुँह फेरकर खड़ा हुआ गुरु से बात चीत न करे ॥ १६१-१६५ ॥