मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ मनुस्मृति । अपांक्तेयैर्यदन्यैश्च तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ १७० ॥ दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते । परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः ॥ १७१ ॥ वेद न पढ़नेवाला ब्राह्मण फूस के आग की तरह निर्जीव हो जाता है। ऐसे को हव्य और कव्य न देना चाहिए। क्योंकि, राख, में होम नहीं किया जाता है। पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को हव्य, कव्य देने से, जो दाता को फल होता है, वह सब कहता हूं। वेदव्रतरहित ब्राह्मण और परिवेत्ता आदि और पंक्तिवाह्य ब्राह्मणों को जो देव, पितृकार्य में भोजन कराया जाता है वह राक्षसभोजन है। जो छोटा भाई बड़े भाई के रहते, उसके पहले विवाह और अग्निहोत्र करता है उसको परिवेत्ता कहते हैं। और बड़े भाई को परिवित्ति कहते हैं ॥ १६८-१७१ ॥ परिवित्तिः परिवेत्ता यया च परिविद्यते । सर्वे ते नरकं यान्ति दातृयाजकपञ्चमाः ॥ १७२ ॥ भ्रातुर्मृतस्य भार्यायां योऽनुरज्येत कामतः । धर्मेणापि नियुक्तायां स ज्ञेयो दिधिषूपतिः ॥ १७३ ॥ परदारेषु जायेते द्वौ सुतौ कुण्डगोलकौ । पत्यौ जीवति कुण्डः स्यान्मृते भर्तरि गोलकः ॥ १७४ ॥ तौ तु जातौ परक्षेत्रे प्राणिनौ प्रेत्य चेह च । दत्तानि हव्यकव्यानि नाशयेते प्रदायिनाम् ॥ १७५॥ परिवित्ति, परिवेत्ता और ये जिस कन्या से विवाह करते हैं वह पांचवां कन्या देनेवाला और विवाह करनेवाला सब नरक को जाते हैं। भाई की मृत्यु होनेपर उसकी स्त्री से कामवश जो नियोग करता है उसको 'दिधिषूपति' कहते हैं। दूसरे की स्त्री से उत्पन्न दो पुत्रों की कुण्ड और गोलक संज्ञा है। पति के जीते, जार सें