भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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चौथा अध्याय। १५३ नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्राद्धिनो द्विजः । आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम् ॥ २२३ ॥ श्रोत्रियस्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्धुषेः । मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् ॥ २२४ ॥ तान्प्रजापतिराहैत्य मा कृध्वं विषमं समम् । श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् ॥ २२५ ॥ इसप्रकार जो अन्न कहे गये हैं और ऐसेही दूसरे प्रकार के अन्न को त्वचा, हड्डी और रोम की भांति विद्वानोंने कहा है । इन सब अन्नों को अज्ञान से खा लेवे तो तीन दिन व्रत करे और जान- कर खाया हो तो भी कृच्छ्र व्रत करे । विद्वान् ब्राह्मण श्रद्धाहीन शूद्र के घर पक्वान्न न खाय, यदि अन्न न हो तो एक दिन के लिए कच्चा सीधा उससे ले लेना चाहिए । वेद पढ़कर भी कृपण हो, दाता भी व्याजखोर हो, इन दोनोंके अन्न को देवताओं ने एक भांति कहा हैं । पर ब्रह्माजी ने देवताओं के पास जाकर कहा कि-विषम को सम न करना, व्याजखोर होने परभी दाता का अन्न श्रद्धासे पवित्र होता है । और वेद पढ़कर भी कृपण का श्रद्धारहित अन्न अपवित्र होता है ॥ २२१-२२५ ॥ श्रद्धयेष्टं च पूतं च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्द्धनैः ॥ २२६ ॥ दानधर्मं निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्त्तिकम् । परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ॥ २२७ ॥ यत्किञ्चिदपि दातव्यं याचितेनानसूयया । उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत्तारयति सर्वतः ॥ २२८ ॥ द्विज को श्रद्धा से यज्ञ, कूप, धर्मशाला आदि बनवाना चाहिए । सुमार्ग से मिले धन से यह काम करने से बड़ा फल होता है । २०